हरियाणा में जिस तरह सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को मंदिर का प्रसाद बांटने के काम में लगा दिया गया, उससे यही पता चलता है कि राज्य सरकार की प्राथमिकताओं में शिक्षा की जगह क्या है! गौरतलब है कि यमुनानगर के बिलासपुर में हर साल कपालमोचन मेला लगता है। वहां इस बार काफी संख्या में शिक्षकों को प्रसाद बांटने और मंदिरों-घाटों पर दानपात्र की देखरेख की ड्यूटी में लगा दिया गया। बीते उनतीस अक्तूबर को प्रशासन ने अध्यापकों के लिए एक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया था, जिसमें उन्हें पुजारी के काम सिखाए जाने थे। सरकारी स्कूलों में शिक्षा की स्थिति को लेकर चिंतित किसी भी व्यक्ति की नजर में यह एक विचित्र फैसला होगा। स्वाभाविक ही हरियाणा राजकीय अध्यापक संघ ने इस पर आपत्ति जताई और इसे स्कूली पढ़ाई-लिखाई में बाधा बताया। जब शिक्षकों और उनके संगठनों के विरोध के बाद मामले ने तूल पकड़ना शुरू किया तो मुख्यमंत्री ने इसे स्थानीय प्रशासन का मामला बता कर अपना पल्ला झाड़ लिया। जबकि प्रशासन की ओर से पुजारी के काम के लिए जो प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया था, उसमें हिस्सा नहीं लेने वाले अध्यापकों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का समन भेजा गया।
सवाल है कि क्या स्थानीय प्रशासन ने उन अध्यापकों की ड्यूटी मंदिर में लगाने का फैसला राज्य सरकार की जानकारी के बगैर लिया था! अगर सरकार इस फैसले से खुद को अलग बता रही है तो इसका मतलब यह होना चाहिए कि वह इस कदम को गलत मानती है। तो क्या इस फैसले के लिए जिम्मेवार अफसरों के खिलाफ वह कोई कार्रवाई करेगी? यह सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है कि स्कूलों में पठन-पाठन में कोई बाधा न आए। लेकिन इसके उलट, प्रशासन के आदेश के तहत शिक्षकों को गैर-शिक्षण कामों में लगाया जा रहा है। इसके अलावा, क्या यह कदम देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को चोट पहुंचाने जैसा नहीं है? अध्यापक संघ ने ठीक सवाल उठाया है कि हम एक धर्मनिरपेक्ष देश में रहते हैं और शिक्षकों को किसी भी खास धर्म के आयोजनों में ड्यूटी पर नहीं लगाया जाना चाहिए, अन्यथा दूसरे धर्मों से जुड़े त्योहारों के मौकों पर भी ऐसी ही मांग खड़ी हो सकती है।
देश भर के सरकारी स्कूल किस तरह शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं और इसका शिक्षा के स्तर पर कैसा असर पड़ रहा है, यह किसी से छिपा नहीं है। जो शिक्षक हैं भी, उनकी अलग-अलग सरकारी कार्यक्रमों में ड्यूटी लगा दी जाती है। समाज कल्याण योजनाओं में गणना करने या आंकड़े इकट्ठा करने, बीएलओ की ड्यूटी देने, जनसेवा सर्वेक्षण, खुले में शौच करने वालों की सूचना देने, कई जयंती-समारोहों में हिस्सेदारी करने के काम आमतौर पर शिक्षकों के ही जिम्मे होते हैं। यह बेवजह नहीं कि सरकारी शिक्षा-व्यवस्था में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। ‘प्रथम’ नामक गैर-सरकारी संगठन के सालाना सर्वेक्षण से हर साल यह पता चलता है कि पांचवीं या छठी कक्षा के विद्यार्थी दूसरी कक्षा की किताबें भी नहीं पढ़ पाते। सवाल है कि हमारी सरकारें या संबंधित महकमे शिक्षकों को गैर-शिक्षण कार्यों में लगाने के लिए क्यों इतने उत्साहित रहते हैं, जबकि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई की शोचनीय दशा का एक प्रमुख कारण शिक्षकों की कमी ही है।

