देश के अग्रणी राज्य गुजरात के अमदाबाद सिविल अस्पताल में छत्तीस घंटे के भीतर ग्यारह नवजात बच्चों की मौत न सिर्फ दुखदायी है बल्कि चिकित्सा व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाती है। बदइंतजामी की वजह से अगस्त में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृहनगर गोरखपुर के बीआरडी चिकित्सालय में तीन-चार दिनों के अंदर तीस से ज्यादा बच्चों की मौत हो गई थी, जिसकी चर्चा पूरे देश में हुई थी। इसके बाद महाराष्ट्र के नाशिक में पचपन बच्चों की मौत हुई। ये दोनों मामले पूरे देश में छाए रहे। इसके बावजूद, अब गुजरात में इसी तरह बच्चों की सामूहिक मौत होना यही सिद्ध करता है कि सरकारें और अधिकारी पुरानी घटनाओं से कोई सबक नहीं लेते। इस बात को अगर दरकिनार कर दिया जाए कि किस पार्टी की सरकार है या नहीं है, तो भी यह सवाल बनता है कि इसकी जिम्मेदारी क्यों न तय की जाए? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गुजरात से विशेष जुड़ाव है और यह माना जाता है कि गुजरात में चिकित्सा व्यवस्था दूसरे तमाम राज्यों से बेहतर है। इसके बावजूद ऐसी लापरवाही का होना गंभीर मामला है। राज्य सरकार को यह देखना चाहिए कि आखिर किस स्तर पर व्यवस्था में चूक हुई है। सिर्फ कारण गिना देना बहानेबाजी से ज्यादा कुछ नहीं है।
हालांकि मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने मामले में तत्परता बरती है और जांच के आदेश दिए हैं। ग्यारह बच्चों की मौत हुई, जिनमें नौ मामलों कीजांच के आदेश दिए गए हैं। अस्पताल के अधिकारियों ने कहा कि बच्चे देहात क्षेत्र से लाए गए थे, क्योंकि दिवाली की वजह से ग्रामीण क्षेत्र के चिकित्साधिकारी छुट्टी पर थे। इसलिए गर्भवती महिलाओं को अस्पताल पहुंचाने में देरी हुई। लेकिन यह सब कोई मान्य बहाना नहीं है। गर्भवती माताओं के लिए सरकार कई योजनाएं चला रही है। गर्भकाल में भी उनकी निगरानी की जाती है। अगर गुजरात जैसे राज्य में भी गर्भवती माताओं को पोषण ठीक से नहीं मिल रहा है तो फिर ‘गुजरात मॉडल’ का यह कौन-सा रूप है!
गुजरात विधानसभा का चुनाव भी घोषित हो चुका है और लंबे समय से इस राज्य की समृद्धि की गाथाएं देश भर में सुनाई जा रही हैं। अगर वहां ऐसे बच्चे पैदा हो रहे हैं जिनका वजन बहुत कम है तो राज्य सरकार के लिए लज्जाजनक है। इसका एक अर्थ यह भी है कि गुजरात का ग्रामीण क्षेत्र अब भी कहीं ज्यादा उपेक्षित है और उसकी भी हालत शायद ओडिशा, छत्तीसगढ़ या झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों जैसी ही है। वैसे भी नवजात बच्चों की मृत्यु के मामले में भारत की स्थिति बहुत चिंताजनक है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में बाल मृत्यु-दर की स्थिति भयावह है। 2015 में 2.5 करोड़ बच्चों ने जन्म लिया था, जिनमें से बारह लाख बच्चे पांच साल की आयु पूरी होने से पहले ही मर गए। गरीबी उन्मूलन और महिलाओं के उन्नयन की तमाम योजनाएं होने के बावजूद यह स्थिति परेशान करने वाली है। यह भी देखा जाता है कि योजनाओं में भ्रष्टाचार भी एक बड़ी समस्या है। जब तक इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं होगी तब तक स्थिति सुधरने वाली नहीं है। चिकित्सा ऐसी सुविधा है, जो हर किसी को मिलनी चाहिए। विंडबना यह है कि शिक्षा और सेहत के क्षेत्र में हमारी सरकारों ने जितनी जरूरत थी, उतनी चिंता नहीं की। बल्कि हालत यह हो गई कि दोनों क्षेत्रों में निजीकरण बढ़ता जा रहा है। लेकिन जहां तक प्राथमिक चिकित्सा का सवाल है, उससे सरकारें मुंह नहीं मोड़ सकती हैं।

