नए साल की पूर्व संध्या पर बंगलुरू में कई युवतियों को जिस तरह युवकों की अश्लील हरकतों का शिकार होना पड़ा, वह किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्म की बात है। मगर इस घटना के बाद कुछ नेताओं ने जिस तरह के विचार जाहिर किए, वह बताता है कि भारतीय समाज में अगर स्त्रियों के लिए सहज जीवन का अधिकार अभी दूर की कौड़ी है, तो इसकी वजहें कहां छिपी हैं। पहले कर्नाटक के एक मंत्री ने बेहद लापरवाही से भरा बयान दिया। फिर इसी मसले पर महाराष्ट्र में समाजवादी पार्टी के प्रमुख अबू आजमी ने एक कदम और आगे बढ़ कर उन युवतियों को ही अपने खिलाफ हुए अपराध के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया। सैकड़ों या हजारों लोगों के उत्सव के बीच सार्वजनिक रूप से पुलिस की मौजूदगी में महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा की वजह अगर अबू आजमी को पोशाक, देर रात पार्टी और पश्चिमी संस्कृति में दिखाई देती है, तो उनके सोचने के स्तर पर अफसोस जताया जाना चाहिए।
यह इसलिए भी ज्यादा शर्मनाक है कि सार्वजनिक जीवन में वे जनता के नुमाइंदे के तौर पर देखे-जाने जाते हैं और उनके जाहिर किए गए विचार केवल उन तक सीमित नहीं रहते। समाज के नुमाइंदों के सार्वजनिक विचार सामान्य लोगों के बीच एक मानस का निर्माण भी करते हैं। सवाल है कि जो समाज आधुनिकता और बराबरी के सभ्य मूल्यों के साथ बहुत धीरे-धीरे आगे का सफर तय कर रहा है, उसके आलोक में अबू आजमी के इस विचार को कैसे देखा जाएगा! जैसी राय उन्होंने जाहिर की, उसके मुताबिक क्या वे चाहते हैं कि महिलाएं घर में कैद होकर अपनी जिंदगी गुजार दें? परिवार, समाज और राजनीति के बीच परंपरा और मानसिकता के बहुत सारे मोर्चों पर दशकों के संघर्ष के बाद महिलाओं ने अपनी काबिलियत के साथ देश और दुनिया में अपनी जगह बनानी शुरू की है। सार्वजनिक गतिविधियों में शिरकत करते हुए वे भी बराबरी की जिंदगी जीना चाहती हैं। समानता के मूल्यों में विश्वास करने वाले किसी भी समाज के लिए यह सहज स्थिति होनी चाहिए। लेकिन इस सामाजिक विकास पर खुश होने और उसमें अपनी भूमिका निभाने के बजाय महिलाओं के फिर से खौफ और अन्याय की चारदिवारी के भीतर लौटने की वकालत करते हुए हमारे नेता क्या यह नहीं सोचते कि वे किस जड़ समाज की वकालत कर रहे हैं?
अबू आजमी इसके पहले भी एक बार शादी से पहले शारीरिक संबंध बनाने वाली लड़कियों को फांसी पर चढ़ाने की वकालत कर चुके हैं। मगर अच्छा यह है कि उनकी मानसिक ग्रंथियां खुद उनके परिवार तक में अस्वीकार्य हैं। तब भी उनकी बहू आयशा टाकिया ने उनके बयान पर शर्मिंदगी जाहिर की थी और इस बार खुद उनके बेटे फरहान आजमी ने उनकी राय के ठीक उलट साफतौर पर कहा है कि बलात्कार या छेड़छाड़ अपराध है और इसके लिए सजा दिए जाने के मसले पर हमें किसी की राय की जरूरत नहीं है; एक लड़की की पोशाक या उसके साथ-संगत पर अंगुली नहीं उठाई जा सकती। एक सभ्य समाज के नुमाइंदे किसी भी अपराध और अन्याय के खिलाफ पीड़ित के पक्ष में खड़े होते हैं और ऐसी बातों पर जोर देते हैं, ताकि भविष्य में न्याय-आधारित एक व्यवस्था बन सके। मगर महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामले में हमारे कुछ नेताओं के बयान समाज में स्त्री-विरोधी आपराधिक यौन कुंठाओं को तुष्ट और पुष्ट करते हैं।

