समान रैंक समान पेंशन यानी ओआरओपी के मुद्दे पर विरोध कर रहे एक पूर्व सैनिक ने खुदकुशी कर ली तो जैसे विपक्षी दलों को अपनी सियासत चमकाने का मौका मिल गया। हालांकि सरकार समान रैंक समान पेंशन योजना के तहत पूर्व सैनिकों की पेंशन का भुगतान काफी हद तक कर चुकी है। मगर कुछ बिंदु ऐसे हैं, जिन्हें लेकर विवाद अभी खत्म नहीं हो पाया है। जिस सैनिक ने खुदकुशी की उसे बैंक की गड़बड़ी के चलते उचित राशि नहीं मिल पा रही थी। उसे सुधारना कोई बड़ा काम नहीं था, इसलिए इसे ऐसा मसला नहीं माना जा सकता कि उसकी हताशा इस हद तक पहुंच गई कि उसने जान दे देना उचित समझा। न यह तीस साल तक अपनी सेवाएं दे चुके एक सैनिक की बहादुरी मानी जा सकती है। मामला पेंशन की राशि से अधिक एक सिपाही के सम्मान का है। सरकार ने अपने वादे के मुताबिक समान रैंक समान पेंशन योजना लागू कर तो दी, पर कुछ मामूली बिंदुओं को सुलझाना उसने जरूरी नहीं समझा। पहले इस योजना को लागू करते समय उन सैनिकों को बाहर रखा गया था जो समय पूर्व अवकाश ग्रहण कर चुके थे। इस पर सैनिक भड़क उठे, तो प्रधानमंत्री ने खुद उसे दुरुस्त किया और कहा गया कि जिन सैनिकों ने अपंग हो जाने या युद्ध में चोट की वजह से अशक्त होने के कारण अवकाश ग्रहण किया है, उन्हें इसके दायरे में रखा जाएगा। सैनिकों की दूसरी मांग थी कि पेंशन की समीक्षा हर साल होनी चाहिए, मगर सरकार ने कहा कि ऐसा करा पाना संभव नहीं होगा। उसने हर पांच साल पर समीक्षा कराने का प्रावधान रखा। फिर पेंशन संबंधी किसी भी शिकायत के लिए एक अवकाशप्राप्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में न्यायाधिकरण गठित किया गया, जबकि पूर्व सैनिकों की मांग थी कि इसमें दो अवकाश प्राप्त सेनाधिकारी भी रखे जाएं। मगर सरकार ने इसे भी मानने से इनकार कर दिया। हालांकि जब सरकार ने सैकड़ों करोड़ रुपए का बोझ वहन करते हुए ओआरओपी लागू कर दिया तो उसे इन छोटी बातों को लेकर जिद पर अड़े रहने की कोई तुक नहीं थी।
विचित्र है कि इन मांगों को लेकर पूर्व सैनिक लगातार सरकार को ज्ञापन देते आ रहे हैं, पर उनके साथ कोेई राजनीतिक दल खड़ा नहीं हुआ। जब एक पूर्व सैनिक ने आत्महत्या कर ली तो कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के नेता अस्पताल में उसके परिजनों को सांत्वना देने पहुंच गए। यह सैनिकों का सम्मान नहीं, बल्कि अपनी सियासत चमकाने की रणनीति है। आजकल मसले इस कदर राजनीतिक रूप ले लेते हैं कि उनका असल मकसद ही कई बार धुंधला जाता है। केंद्रीय मंत्री वीके सिंह, जो खुद सेनाध्यक्ष रह चुके हैं, उन्होंने भी इस मसले पर संयमित बयान देने के बजाय राजनीतिक उसे रंग दे दिया। पूर्व सैनिक का खुदकुशी का रास्ता अख्तियार करना निस्संदेह चिंता का विषय है, पर इसे राजनीतिक स्वार्थ साधने का जरिया बनाने के बजाय मिल-बैठ कर सोचने की जरूरत है कि ओआरओपी लागू होने के बावजूद पूर्व सैनिकों में असंतोष की वजह क्या है। जो मसला लंबे समय से लटका हुआ था, उसे हल करके सरकार ने निस्संदेह सराहनीय काम किया, पर उसमें ऐसी क्या कमियां रह गई हैं, जिन्हें दूर करना जरूरी है, यह भी सोचना उसी का काम है। इसके लिए पूर्व सैनिकों के अगुआ लोगों से बातचीत करने में कोई हिचक क्यों होनी चाहिए।
