हजार और पांच सौ के नोटों के विमुद्रीकरण के फैसले के हफ्ते भर बाद भी जहां अफरातफरी और सियासी रस्साकशी जारी है, वहीं लोग रोज नए नियम जारी होने से भी हैरान और हलकान हैं। इससे लोगों की इस धारणा को और बल मिल रहा है कि सरकार ने इतना बड़ा फैसला बिना मुकम्मल तैयारी के कर लिया। और उसकी आधा-अधूरी तैयारी के कारण एक तरफ बैंकों व एटीएम के बाहर कतारें खत्म होने का नाम नहीं ले रहीं, तो दूसरी ओर घर-घर से लेकर पूरे देश तक की अर्थव्यवस्था डावांडोल है। प्रधानमंत्री ने आठ नवंबर को पांच सौ और हजार के नोटों के विमुद्रीकरण की घोषणा की थी। तब से सरकार नौ दिन में अठारह फैसले कर चुकी है। आए दिन नए फैसलों के अलावा पुराने फैसलों में संशोधन भी किए जा रहे हैं। मसलन, पहले पुराने नोट बदलने की सीमा साढ़े चार हजार रुपए थी; शुक्रवार से यह सीमा दो हजार रुपए कर दी गई। नोटों की अदलाबदली की लाइन में लगे लोगों की उंगली पर स्याही लगाने का फरमान सरकार ने जारी किया। इसके चौबीस घंटे भी नहीं बीते कि वित्त सचिव ने एक ही बार में पांच नई घोषणाएं कर दीं।
आम लोगों को रोज जो परेशानियां भुगतनी पड़ रही हैं वे तो अंतहीन हैं ही, नए-नए नियम घोषित होने से बहुत सारे लोग गफलत में पड़ जा रहे हैं कि ताजातरीन नियम-कायदा क्या है। नियम भी कितने सोच-विचार के बाद घोषित किए जा रहे हैं यह स्याही संबंधी फैसले से जाहिर है। घोषणा के दूसरे ही दिन साफ हो गया कि अमिट स्याही का इंतजाम नहीं है। उस फैसले की भद पिटने में रही-सही कसर चुनाव आयोग के एतराज ने पूरी कर दी है। आयोग ने वित्त मंत्रालय को अमिट स्याही इस्तेमाल न करने को कहा है, क्योंकि पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं और उंगलियों पर अमिट स्याही लगा देने से दिक्कत खड़ी हो सकती है। सरकार के फैसलों जैसा ही हाल उसके आश्वासनों का भी है। लोगों की नाराजगी को शांत करने के लिए वित्तमंत्री रोज कुछ न कुछ आश्वासन देते हैं। कभी यह कि नगदी की किल्लत जल्दी ही दूर हो जाएगी। कभी कहते हैं कि सारे एटीएम शीघ्र ही नए नोटों के अनुरूप बना दिए जाएंगे। लेकिन ज्यादातर एटीएम अब भी सूखे ही मिलते हैं और नगदी की तंगी जस की तस है।
जब चारों तरफ से खुले पैसे की शिकायतें आने लगीं तो भरोसा दिलाया गया कि पांच सौ और हजार के नोट भी आएंगे। पांच सौ के नोट कहीं-कही मिलने शुरू हो गए हैं, पर वित्तमंत्री ने अब साफ कह दिया है कि हजार के नोट नहीं आएंगे। नए-नए फैसलों और घोषित निर्णयों में जल्दी-जल्दी फेरबदल के चलते शायद सबसे बुरा अंदेशा यह है कि कई लोग सोचने-विचारने की जहमत नहीं उठाते और निराधार चर्चा को भी सही मान ले सकते हैं। सरकार की भावी योजनाओं की बाबत कई लोग इंतजार करने के बजाय अपने अनुमान से कोई बात छेड़ देते हैं। कुछ दिन पहले बाजार से नमक गायब होने की अफवाह उड़ी थी। उसके पीछे बदमाशी रही हो या निपट अज्ञान, उसे नोटबंदी के बाद मची अफरातफरी से अलग करके नहीं देखा जा सकता। बदली हुई परिस्थितियों में सरकार को नए फैसले करने पड़ सकते हैं, मगर वे हरेक पहलू पर अच्छी तरह सोच-विचार के बाद ही किए जाने चाहिए।

