अमेरिका के राष्ट्रपति का विदाई-भाषण उस देश के लिए तो मायने रखता ही है, बाकी दुनिया भी उसमें खूब दिलचस्पी दिखाती है। फिर, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का राष्ट्र के नाम आखिरी संबोधन एक और वजह से खास था। वे ऐसे समय वाइट हाउस से विदा हो रहे हैं, जब अमेरिका ने अपने लोकतांत्रिक इतिहास के सबसे कटुता भरे चुनाव में अपना नया राष्ट्रपति चुना है। यह विडंबना ही है कि 2008 में जब ओबामा पहली बार अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए थे तो उसे इतिहास की सबसे बड़ी खाई पाटने वाली घटना के रूप में देखा गया था- क्योंकि पहली बार एक अश्वेत अमेरिका का राष्ट्रपति बना- और जब वे लगातार दो कार्यकाल पूरा कर राष्ट्रपति पद छोड़ने जा रहे हैं, तो अमेरिका में लोकतांत्रिक मूल्यों तथा सामाजिक सरोकारों को लेकर चिंता छाई हुई है। इसलिए ओबामा ने पद छोड़ने से दस दिन पहले दिए अपने विदाई भाषण में उचित ही उन चिंताओं को सामने रखा, लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता तथा सामाजिक सौहार्द को अमेरिका की पहचान बताया, और अपने उत्तराधिकारी डोनाल्ड ट्रम्प को नसीहत दी कि अमेरिकी मुसलिमों समेत देश के सभी अल्पसंख्यकों की रक्षा करना हमारा दायित्व है; अमेरिकी मुसलिम भी उतने ही देशभक्त हैं जितने अन्य अमेरिकी।
यह सब कहने के साथ ही ओबामा ने संकेत दिया कि पद छोड़ने के बाद भी वे इन चिंताओं को मुखरित करते रहेंगे। उम्मीद की जानी चाहिए कि वे आगे भी अमेरिका की एक शक्तिशाली आवाज बने रहेंगे। उनकी विदाई के साथ स्वाभाविक ही यह सवाल उठता है कि उनके कार्यकाल को किस तरह याद किया जाएगा। हो सकता है कि उनका जिक्र सबसे ज्यादा इसी संदर्भ में हो कि पहली बार एक अश्वेत को राष्ट्रपति बनने का मौका मिला। लेकिन उनके कार्यकाल के खाते में कई यादगार काम दर्ज हैं। उन्होंने ईरान को अपना परमाणु कार्यक्रम छोड़ देने के लिए राजी किया। क्यूबा से कूटनीतिक रिश्ते कायम किए। इराक और अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों को वापस बुलाया। कुछ महीने पहले हिरोशिमा जाकर अमेरिका के परमाणु हमले पर अफसोस जताया। इसी तरह जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे भी पर्ल हार्बर गए और जापान के हवाई हमले में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित की। अलबत्ता ओबामा के शांति के सारे प्रयास मंजिल पर पहुंच ही गए हों, फिलहाल यह नहीं कहा जा सकता।
ईरान से परमाणु समझौते तथा क्यूबा से कूटनीतिक संबंधों की बहाली का तार्किक परिणति पर पहुंचना अभी बाकी है। फिर, ओबामा ने उसामा बिन लादेन से तो छुटकारा दिला दिया, मगर जब वे विदा हो रहे हैं तो दुनिया आइएसआइएस से आतंकित है। ‘ओबामा केयर’ के रूप में उन्होंने देश को एक ऐसी स्वास्थ्य नीति दी, कि गरीब से गरीब आदमी भी इलाज करा सके। लेकिन संबंधित कानून जितना सशक्त होना चाहिए था, नहीं है। लिहाजा, ट्रम्प के सत्ता संभालने के बाद इस स्वास्थ्य नीति को पलीता लगा दिए जाने का अंदेशा है, जिसका संकेत ट्रम्प दे चुके हैं। इसी तरह की आशंका ओबामा के समय बनी जलवायु नीति को लेकर भी है। ट्रम्प जलवायु संकट से निपटने की खातिर होने वाले खर्च को नाहक पैसे की बरबादी मानते हैं। निवर्तमान राष्ट्रपति और आने वाले राष्ट्रपति के बीच के फर्क ने ओबामा के कार्यकाल को और प्रशंसनीय बना दिया है, अन्यथा उनका कार्यकाल मिश्रित ही रहा है।

