एक के बाद एक चुनावी झटकों से खस्ताहाल कांग्रेस के हाल का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अब वह अलग-अलग राज्यों में अपने विधायकों की वफादारी बचाने के लिए हलफनामे का सहारा ले रही है। कांग्रेस की नीतियों और सिद्धांतों के प्रति निष्ठा का आकलन अब किसी सदस्य के समर्पण और जनता के बीच पार्टी की स्थिति मजबूत करने के बजाय इस बात से होगा कि उसने शपथपत्र पर अपनी वफादारी की घोषणा की या नहीं! गौरतलब है कि पंजाब में 2017 में होने वाले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी का टिकट चाहने वालों को सत्यापित घोषणापत्र पर हस्ताक्षर के जरिए यह वादा करने को कहा गया है कि अगर किसी निर्वाचन क्षेत्र के लिए उनका चयन नहीं हुआ तो वे किसी भी कांग्रेसी उम्मीदवार के खिलाफ चुनाव नहीं लड़ेंगे और उसे पूरा समर्थन देंगे।
करीब दो महीने पहले पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भी टिकटार्थियों से ऐसा ही हलफनामा लिया गया था, जिसमें उन्हें सौ रुपए के स्टाम्प पेपर पर यह लिख कर बताना पड़ा कि वे ‘पार्टी विरोधी किसी गतिविधि’ में शामिल नहीं होंगे और न ही पार्टी के खिलाफ कोई बयानबाजी करेंगे। पिछले कुछ सालों से निजी महत्त्वाकांक्षाओं और फौरी लाभ के लिए दल बदलने के बहुतेरे मामले सामने आते रहे हैं। उसे देखते हुए यह पहल पहली नजर में पार्टी में अनुशासन बनाए रखने के लिए की गई कवायद लगती है। कुछ समय पहले अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में अपने विधायकों की बगावत झेल चुकी कांग्रेस की चिंता स्वाभाविक है। लेकिन सवाल है कि फिर कांग्रेस पार्टी के अपने ढांचे में लोकतांत्रिक होने के दावे को कैसे देखा जाएगा! क्या पार्टी को अपनी नीतियों और सिद्धांतों पर इतना भरोसा नहीं रह गया है कि वह इनके बूते अपने सदस्यों की निष्ठा बहाल रख सके? आखिर किन वजहों से सदस्यों के भीतर महत्त्वाकांक्षाओं का टकराव खड़ा होता है और पार्टी नेतृत्व उसे दूर करने में इस कदर नाकाम रहता है कि उन्हें एकजुट नहीं रखा जा पाता?
सारे दल खुद को लोकतांत्रिक ही कहते हैं। लेकिन शायद ही किसी दल के सदस्यों को अपनी किसी ऐसी राय को सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्त करने का हक होता है, जिसमें उनकी पार्टी भी कठघरे में आए। आंतरिक लोकतंत्र की हालत यह है कि अगर कभी किसी सदस्य ने पार्टी के किसी फैसले से असहमति जता दी तो अनुशासनिक कार्रवाई के नाम पर आमतौर पर उसे पार्टी से निकाल दिया या निलंबित कर दिया जाता है। जाहिर है, इसके पीछे कारण जितना अनुशासन का उल्लंघन होता है, उससे ज्यादा अपने सदस्यों की किसी राय से पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के सामने खड़ी हो सकने वाली असहज परिस्थितियां होती हैं। दूसरी पार्टियों की ओर से आने वाली आलोचनाओं के मुकाबले अपने ही किसी सदस्य की ओर से सार्वजनिक रूप से पार्टी पर उठाए जाने वाले सवालों से विश्वसनीयता का ज्यादा नुकसान होता है। इसके अलावा, प्रतिबद्धता या वफादारी साबित करने के लिए अपने विधायकों से हलफनामा लिखवाना क्या संबंधित व्यक्ति की प्रतिबद्धता पर संदेह करना नहीं है? किसी व्यक्ति पर संदेह करके उसका विश्वास कैसे हासिल किया जा सकता है?

