उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के साथ ही कुछ मामलों में प्रशासनिक चुस्ती और कुछ मामलों में स्वत: मनमानियों पर लगाम लगती दिखने लगी है। प्रदेश में अवैध रूप से चल रहे बूचड़खानों को बंद किया जाना इसका एक उदाहरण है। प्रशासन ने बूचड़खानों के खिलाफ सख्ती शुरू कर दी है। कई कसाईबाड़ों में छापेमारी कर तालाबंदी की गई। भारतीय जनता पार्टी ने अपने दृष्टि-पत्र में वादा किया था कि अगर उत्तर प्रदेश में उसकी सरकार बनी तो राज्य में अवैध बूचड़खाने बंद किए जाएंगे। हालांकि पर्यावरण प्रदूषण के मद््देनजर इलाहाबाद उच्च न्यायालय और राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने बहुत पहले अवैध बूचड़खानों पर नकेल कसने का आदेश दिया था, पर राज्य सरकार की अनदेखी के चलते पशुओं के मांस का गैर-कानूनी कारोबार फल-फूल रहा था।

कई जिलों में एक भी बूचड़खाने को लाइसेंस प्राप्त नहीं है, पर वहां मांस के दर्जनों कारखाने चल रहे हैं। जहां एक-दो कसाईबाड़ों को लाइसेंस प्राप्त है, वहां कई दर्जन बूचड़खाने अवैध रूप से चल रहे हैं। अब वे डरे हुए हैं कि उनके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। दरअसल, पिछले कुछ सालों में मांस-बिक्री काफी बढ़ी है और इसमें मुनाफे की दर अधिक है, इसलिए बहुत सारे लोग अवैध रूप से इस कारोबार में उतर आए हैं। जिन्हें लाइसेंस मिला हुआ है, वे भी तय सीमा से अधिक पशुओं की कटाई करते हैं। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भैंसों के मांस निर्यात के मामले में उत्तर प्रदेश अव्वल है। पूरे देश के मांस उत्पादन में करीब अट्ठाईस फीसद हिस्सा अकेले उत्तर प्रदेश का है। ऐसे में अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि इन बूचड़खानों से निकलने वाली गंदगी से आसपास की नदियों और इलाकों में कितना प्रदूषण फैलता होगा।

बूचड़खानों को लेकर भी नियम-कायदे बने हुए हैं, उनका उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई को अनुचित नहीं कहा जा सकता। पशुओं की अवैध कटाई और पर्यावरण की अनदेखी आखिरकार पारिस्थितिकी तंत्र को असंतुलित बनाती है। इस दृष्टि से अगर प्रशासन ने मुस्तैदी बरतनी शुरू की है, तो अच्छी बात है। मगर पिछले कुछ समय से जिस तरह गोवध पर अंकुश लगाने, गोमांस की बिक्री रोकने आदि को लेकर उपद्रव की घटनाएं हुर्इं, उसमें कुछ लोगों की जान तक चली गई, वैसे में उत्तर प्रदेश प्रशासन को ध्यान रखना होगा कि बूचड़खानों के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर उस तरह की कोई घटना न होने पाए।

मांसाहार या शाकाहार व्यक्ति का निजी चुनाव हो सकता है, उसे अपनी आहार संबंधी आदतों को बदलने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। कई इलाकों में लोग मुख्य रूप से मांसाहारी हैं, मगर इसका यह अर्थ कतई नहीं कि अवैध रूप से मांस की बिक्री बढ़ाने में उनका योगदान है।उनकी आहार संबंधी जरूरतों को किसी आस्था या विचारधारा के नाम पर बाधित नहीं किया जाना चाहिए। महाराष्ट्र में पर्यूषण पर्व के मौके पर जिस तरह मांस की बिक्री को प्रतिबंधित किया गया और उसे लेकर विवाद खड़ा हुआ, उससे भी सबक लेने की जरूरत है। अगर प्रशासन अदालत के आदेश का पालन करते हुए अवैध बूचड़खानों के खिलाफ कार्रवाई करे, उसकी मंशा महज किसी को खुश करने की न हो, तो विवाद और पक्षपात से बचा जा सकता है।