हाल के दिनों में जम्मू-कश्मीर में आतंकी संगठनों के खिलाफ सेना को जैसी अहम कामयाबी मिली है, उससे लगता है कि वहां आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई निर्णायक दौर में पहुंच गई है। रविवार की रात दक्षिणी कश्मीर के शोपियां जिले में सेना, सीआरपीएफ और राज्य की पुलिस ने आतंकवादियों की मौजूदगी का सुराग पाकर अवनीरा गांव की घेराबंदी कर दी। इसके बाद तलाशी अभियान के दौरान जब आतंकियों ने गोलीबारी शुरू कर दी तब सुरक्षा बलों ने जवाबी कार्रवाई की, जिसमें तीन आतंकी मारे गए और दो सैनिक शहीद हो गए। पूरी रात चली इस मुठभेड़ की उपलब्धि यह रही कि इस इलाके में हिज्बुल मुजाहिदीन के मुख्य अभियान कमांडर यासीन इटू उर्फ ‘गजनवी’ को मार गिराया गया। गौरतलब है कि इटू को ‘ए प्लस प्लस’ यानी बेहद खतरनाक आतंकियों की श्रेणी में रखा गया था। पुलिस के मुताबिक मध्य कश्मीर के बडगाम जिले का निवासी इटू काफी समय से हिज्बुल मुजाहिदीन से जुड़ा हुआ था। बीते साल जब सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में बुरहान वानी मारा गया तो हिज्बुल ने उस इलाके में अपनी मौजूदगी दर्शाने के मकसद से लगातार अशांति कायम रखने के काम में इटू को ही लगाया था।

विडंबना यह है कि समूचे इलाके में सेना और सुरक्षा बलों की ओर से की जा रही निगरानी और तमाम सख्ती के बावजूद इटू को अपने कार्यभार वाले इलाके में खासी कामयाबी मिली और उसने अपने संगठन में कई युवाओं की भर्ती भी कराई। जाहिर है, हिज्बुल जैसे संगठन के साथ काम करने के मकसद से कच्चे दिमाग वाले युवाओं को तैयार करने के लिए जिस क्षमता और कुशलता की जरूरत थी, वह इटू के भीतर मौजूद थी। सवाल है कि अगर किसी आतंकी रास्ते में भरोसा करने वाला व्यक्ति दूसरे युवाओं को अपनी सोच के मुताबिक ढालने में कामयाब हो सकता है तो क्या इसके विपरीत ध्रुव से किशोरों या युवाओं से संवाद स्थापित करने की रणनीति नहीं अपनाई जा सकती! शासन की ओर से केवल सुरक्षा बलों और बंदूकों के बल पर निपटने की रणनीति के बीच इस मोर्चे पर गौर करने को जरूरी महत्त्व नहीं दिया गया है।

यासीन इटू का मारा जाना इस ओर भी इशारा करता है कि पिछले कुछ समय से आतंकी गिरोहों का सामना करने के मामले में सेना और जम्मू-कश्मीर की पुलिस के बीच तालमेल बढ़ा है और शायद खुफिया तंत्र को भी सूचनाएं हासिल करने में पहले से ज्यादा कामयाबी मिलने लगी है। दरअसल, कुछ समय पहले जिस तरह स्थानीय लोगों ने उकसावे में आकर एक पुलिस अफसर को पीट-पीट कर मारा डाला था, उसके बाद पुलिस महकमे में भी आतंकी संगठनों के खिलाफ रोष पैदा हुआ और उसने अपने सूचना तंत्र से मिली जानकारियों को सेना के साथ साझा करना शुरू कर दिया। यही वजह है कि बीते एक महीने के दौरान लश्कर-ए-तैयबा के शीर्ष कमांडर अबू दुजाना सहित ‘ए प्लस प्लस’ श्रेणी में रखे गए कई आतंकियों को मार गिराने में कामयाबी मिली। पिछले छह महीनों में सुरक्षा बलों के हाथों मारे गए आतंकवादियों की तादाद लगभग सौ हो चुकी है। दूसरी ओर, खुद पुलिस का कहना है कि केवल इस साल अब तक पचास से ज्यादा कश्मीरी युवक आतंकवाद से जुड़े हैं। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि कश्मीर में जब तक जमीनी स्तर पर नागरिकों के बीच विश्वास बहाली के लिए कुछ ठोस नहीं किया जाएगा, तब तक इस स्थिति का फायदा आतंकी संगठनों को मिलता रहेगा।