सर्वोच्च अदालत ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि सड़क सुरक्षा तथा लोक स्वास्थ्य सर्वोपरि है। इसी तकाजे से उसने बीते दिसंबर में राष्ट्रीय तथा प्रांतीय राजमार्गों के किनारे शराब की बिक्री प्रतिबंधित करने का आदेश दिया था। अलबत्ता यह भी कहा था कि जिनके पास पहले से ऐसी जगहों पर शराब की दुकान चलाने के लाइसेंस हैं, वे इकतीस मार्च तक उसे जारी रख सकते हैं। अदालत के आदेश में कहा गया था कि राजमार्गों के किनारे आधा किलोमीटर के दायरे में शराब की दुकान नहीं हो सकती। इस आदेश का जहां व्यापक स्वागत हुआ, वहीं कई सवाल भी उठे। आदेश के फलस्वरूप राजस्व के अलावा होटल व्यवसाय पर खराब असर पड़ने का अंदेशा जताया जाता रहा है। कुछ अनिश्चितता या अस्पष्टता भी रही। मसलन, क्या यह आदेश राजमार्गों के किनारे पांच सौ मीटर के दायरे में स्थित उन पबों, रेस्तरांओं और होटलों पर भी लागू होगा, जो शराब परोसते हैं। अस्पष्टता का आलम यह रहा कि केंद्र के महाधिवक्ता ने केरल सरकार को दी गई कानूनी परामर्श में कहा था कि सर्वोच्च अदालत का आदेश पबों, बारों, रेस्तराओं और होटलों के लिए नहीं है। लेकिन अदालत ने पिछले हफ्ते साफ कर दिया कि उसका आदेश इन पर भी लागू होता है; अगर इन्हें बख्श दिया जाएगा तो आदेश में निहित मकसद पर ही पानी फिर जाएगा।
पर दूसरी तरफ अदालत ने कुछ रियायत भी दी है। शहरी, कस्बाई या नगरपालिका क्षेत्र, जहां बीस हजार या उससे कम आबादी हो, राजमार्गों के किनारे से 220 मीटर से अधिक की दूरी पर, शराब की दुकान चल सकती है। यह संशोधन करने की जरूरत इसलिए महसूस हुई क्योंकि कई जगह खासकर पहाड़ी इलाकों में दुकानों को किनारे से कम से कम आधा किलोमीटर दूर ले जाना संभव नहीं था। इसीलिए सिक्किम और मेघालय में राजमार्गों के किनारे की शराब की नब्बे फीसद दुकानों को बंद कर दिया गया। ताजा फैसले से उनके मालिकों को राहत मिली होगी। बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय ने शराब पीकर गाड़ी चलाने की खतरनाक प्रवृत्ति पर लगाम लगाने की दृढ़ता दिखाई है। इस प्रवृत्ति को सड़क हादसों का एक बड़ा कारण बताते हुए याचिकाएं दायर की गई थीं। खुद केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय की एक रिपोर्ट बताती है कि 2014 में देश में सड़क दुर्घटनाओं में 1 लाख 46 हजार लोग मारे गए थे। घायल होने वालों की तादाद इससे करीब तीन गुना ज्यादा थी।
लेकिन राज्य सरकारों ने राजस्व के चक्कर में न सिर्फ किनारे से पर्याप्त दूरी के तकाजे की अनदेखी की, बल्कि लाइसेंसों की संख्या भी बढ़ाती गर्इं। राजमार्ग ज्यादा दूरी के सफर के लिए होते हैं, इसलिए उन पर वाहनों की रफ्तार अमूमन तेज होती है। फिर, भारी वाहन ज्यादातर राजमार्गों से ही गुजरते हैं। अगर ऐसी सड़कों के किनारे हर कहीं शराब उपलब्ध हो, तो यह एक खतरनाक व्यवस्था ही होगी, जिसकी गवाही हादसों के आंकड़े देते हैं। राजस्व का उद््देश्य लोक-कल्याण ही होता है। राजस्व अगर लोक-सुरक्षा और लोक-स्वास्थ्य के ही आड़े आए, तो किस काम का? इसलिए राजस्व की दलील अदालत ने पहले ही खारिज कर दी थी। बहरहाल, नशे में गाड़ी चलाने के अलावा, सड़क पर सफर को खतरनाक बनाने वाले कई और कारण भी होते हैं। जैसे, अपात्रों का भी ड्राइविंग लाइसेंस बन जाना और सड़कों की दोषपूर्ण डिजाइन। क्या अन्य कदमों की बाबत भी अदालती आदेश की जरूरत होगी!

