हिमाचल प्रदेश के कोटखाई में सोलह वर्षीय गुड़िया (कल्पित नाम) से बलात्कार और उसकी हत्या के एक आरोपी के कत्ल से फिर यह सवाल उठा है कि अगर पुलिस सुरक्षा के बीच भी किसी की जिंदगी सुरक्षित नहीं है तो आम नागरिकों को कितनी उम्मीद करनी चाहिए। गौरतलब है कि करीब एक पखवाड़े पहले स्कूली छात्रा गुड़िया के गायब होने के बाद जब उसके बलात्कार और हत्या की खबर आई तो आसपास के समूचे इलाके में लोग आक्रोशित हो गए। विरोध प्रदर्शनों के तीखे होते जाने के बाद पुलिस ने छह लोगों को गिरफ्तार किया। इसके बावजूद लोगों ने पुलिस पर मामले के असली आरोपियों को बचाने के आरोप लगाए और सीबीआइ जांच की मांग उठाई। इस बीच पकड़े गए आरोपियों में से एक नेपाली व्यक्ति की हत्या मुख्य आरोपी ने थाने में ही कर दी। मगर आधी रात को हुई इस घटना को लोग एक साजिश बता रहे हैं।

यह केवल आम लोगों के बीच फैला शक नहीं है, बल्कि वहां एक सेवानिवृत्त डीजीपी ने साफतौर पर कहा कि इस हत्या का असर अब सीबीआइ जांच पर भी पड़ेगा, क्योंकि मृतक शायद पुलिस को गुड़िया के असल हत्यारों के बारे में सब बताने को राजी हो गया था। अगर यह सच है तो सभी आरोपियों के साथ पुलिस ने मारे गए व्यक्ति को भी हवालात में एक साथ रखा जाना क्यों जरूरी समझा? यों भी, इस मामले में पुलिस की ओर से अब तक की गई समूची जांच-पड़ताल ही शक के घेरे में थी, इसलिए इस हत्या के पीछे भी लोग साजिश की आशंका जता रहे हैं। सवाल है कि अगर इसमें खुद पुलिसकर्मियों की कोई भूमिका नहीं है तो थाने के भीतर यह कैसे संभव हुआ कि उसमें कोई किसी की हत्या कर दे? अव्वल तो उस समूचे इलाके में सुरक्षा-व्यवस्था की ऐसी हालत है कि एक स्कूली छात्रा के साथ इतना बड़ा अपराध हो जाता है। दूसरे, थाना परिसरों में भी पुलिस अपनी ड्यूटी निभाने में नाकाम है। अगर मारा गया आरोपी वास्तव में घटना के बारे में सब जानता था, तो सीबीआई के सामने चुनौती यह होगी कि वह नए सिरे से अपराध के सूत्र को ढूंढ़े।

कोटखाई थाने में हुई हत्या इस तरह की कोई अकेली घटना नहीं है। खुद राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो के एक आंकड़े के मुताबिक देश भर में पुलिस हिरासत में औसतन हर साल अट्ठानबे लोगों की जान चली जाती है। मानवाधिकार संस्थाओं की रपटें इससे ज्यादा मौतें होने की आशंका जताती हैं। इसमें आरोपियों या फिर दोषसिद्ध अपराधियों के बीच होने वाले खूनी टकराव से लेकर खुद पुलिस की ओर से की जाने वाली हिंसा भी शामिल है। विडंबना यह है कि हिरासत में हुई मौतों के आधे से भी कम मामले दर्ज किए जाते हैं। शायद यह भी एक वजह है कि किसी कैदी की मौत के लिए पुलिसकर्मियों को दोषी करार देने के मामले न के बराबर हैं। आमतौर पर पुलिस की ओर से ऐसी मौतों को आत्महत्या, हादसा या किसी बीमारी का नतीजा बता दिया जाता है। लेकिन यह छिपी बात नहीं है कि ऐसी अधिकतर मौतें पुलिस की प्रताड़ना के चलते होती हैं। बहरहाल, एक आरोपी की मौत ने न केवल अपराध की शिकार छात्रा को इंसाफ मिलने की उम्मीद को धुंधला किया है, बल्कि पुलिसिया तंत्र के साए में मानवाधिकारों के हनन को लेकर भी सवाल उठते हैं।