आखिरकार प्रधानमंत्री ने महीने भर बाद कश्मीर की स्थिति पर चुप्पी तोड़ दी। मगर इस बार भी उन्होंने ऐसी जगह बयान दिया, जहां उसकी जरूरत नहीं थी। वे भारत छोड़ो आंदोलन की जयंती के मौके पर मध्यप्रदेश में चंद्रशेखर आजाद की जन्मस्थली गए थे। इस समय संसद का मानसून सत्र चल रहा है। विपक्ष की मांग पर राज्यसभा में कश्मीर के मसले पर चर्चा भी हुई। ऐसे में अपेक्षा की जा रही थी कि प्रधानमंत्री संसद में इस मुद्दे पर कुछ बोलेंगे। मगर उन्होंने मध्यप्रदेश के एक सार्वजनिक मंच से यह स्वीकार करना मुनासिब समझा कि कश्मीर के मामले में वे भी अटल बिहारी वाजपेयी की इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत की नीति में यकीन करते हैं।

जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने पिछले दिनों कहा था कि कश्मीर के मामले में प्रधानमंत्री को अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय की नीतियों पर अमल करना चाहिए। इसका जवाब उन्होंने मध्यप्रदेश में दिया। इसी तरह गोरक्षा के नाम पर दलितों और मुसलमानों पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ जब उनसे बयान की उम्मीद की जा रही थी, तब वे मौन साधे रहे। बोले भी तो एक सार्वजनिक सभा में। कायदे से जब संसद का सत्र चल रहा हो तो प्रधानमंत्री से अपेक्षा की जाती है कि वे वहां बयान दें और विपक्षी दलों के सवालों पर चर्चा करें, मगर उन्होंने इस परिपाटी को निभाना जरूरी नहीं समझा। कश्मीर में एक महीने से अशांति है। वहां की सरकार केंद्र से मदद की गुहार लगा रही है। मगर हर छोटे-मोटे मसले पर ट्वीट करने वाले प्रधानमंत्री ने इस पर कोई बयान नहीं दिया। यह समझ से परे है कि उन्होंने इस पर चुप्पी क्यों साधे रखी और सदन में बोलने से परहेज क्यों किया।

पिछले एक महीने से कश्मीर में जो स्थिति बनी हुई है, वह कोई सामान्य घटना नहीं है, जिसे प्रधानमंत्री नजरअंदाज भी कर दें तो बहुत फर्क नहीं पड़ेगा। अगर वे सचमुच इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत में यकीन करते हैं तो उन्हें इस मसले पर आंख चुराने की क्या जरूरत है! अलगाववादी बुरहान वानी के जनाजे के वक्त पैदा हुई आंदोलन की स्थिति और फिर हिंसा पर उतारू भीड़ पर काबू पाने के लिए छर्रे वाली बंदूक के इस्तेमाल को लेकर जो मामला गरम हुआ उस पर प्रधानमंत्री ने कुछ बोलने से क्यों गुरेज किया? किसी मसले पर प्रधानमंत्री के बोलने का असर पूरी पार्टी पर दिखाई देता है, सारे मंत्रालयों के कामकाज पर नजर आता है।

इसलिए उनकी चुप्पी को लेकर तरह-तरह के सवाल उठते रहे। जो बात उन्होंने मध्यप्रदेश में जाकर कही, उसे संसद में कहने से वे क्यों बचते रहे हैं। कश्मीर देश का सबसे संवेदनशील राज्य है और वहां के युवा किस कदर गुमराह हो रहे हैं यह किसी से छिपा नहीं है। उनके भविष्य को लेकर अगर वे अपनी चिंता कश्मीर जाकर जताते या फिर संसद में जाहिर करते तो शायद बेहतर होता। अगर उन्हें सचमुच अटल बिहारी वाजपेयी की नीतियों पर यकीन है, तो उन्हें इस मसले पर सर्वदलीय बैठक बुला कर चर्चा करनी चाहिए, कश्मीर के अवाम से संवाद का रास्ता तलाशना चाहिए। केंद्र की संवादहीनता का ही नतीजा है कि गुमराह कश्मीरी युवा एक बार फिर कश्मीर की आजादी की मांग उठाने लगे हैं। क्या इससे पार पाने को लेकर प्रधानमंत्री को चिंतित नहीं होना चाहिए? संसद से बाहर भावुक बयान दे देने भर से इस समस्या का हल नहीं निकलने वाला।