राष्ट्रपति पद पर डोनाल्ड ट्रंप के आने के बाद अमेरिकी प्रशासन और रूस के राष्ट्रपति ब्लादीमिर पुतिन के बीच जो नजदीकी बनती दिख रही थी वह अब खटास में बदल गई है। अमेरिकी सीनेट ने रूस के विरुद्ध कड़ी आर्थिक पाबंदियां लागू करने का एक विधेयक पारित किया है, जिसके तहत दोनों देशों में कई क्षेत्रों में व्यापार नहीं हो पाएगा। माना जा रहा है कि इस प्रतिबंध के दूरगामी परिणाम होंगे। तभी तो रूस के प्रधानमंत्री दिमित्री मेदवेदेव इससे इतने कुपित हो गए कि उन्होंने इस विधेयक को ‘रूस के खिलाफ पूर्ण आर्थिक युद्ध’ की संज्ञा दे डाली। पिछले हफ्ते पारित किए गए विधेयक को ट्रंप प्रशासन को बुधवार को हरी झंडी देनी पड़ी, क्योंकि पुतिन से मित्रता के बावजूद यह मामला सीधे अमेरिका के आंतरिक मामले में दखलंदाजी से जुड़ा था। हालांकि टंÑप ने बुझे मन से ही हस्ताक्षर किए हैं, क्योंकि उन्होंने अपने बयान में कहा कि कांग्रेस के बजाय वे दूसरे देशों से बेहतर समझौता करने की योग्यता रखते हैं। विधेयक अमेरिका को रूसी पाइपलाइनों के विकास में शामिल कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने और कुछ रूसी हथियार निर्यातकों पर प्रतिबंध लगाने की क्षमता रखता है।
विधेयक में 2016 के राष्ट्रपति चुनाव को रूस द्वारा प्रभावित करने, ईरान और उत्तरी कोरिया को ऊर्जा की मदद देने जैसे आरोप हैं। हालांकि रूस ने अमेरिकी विधेयक में शामिल तथ्यों से इनकार किया है। मगर चेतावनीस्वरूप रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने भी पिछले रविवार को अपने देश में पदस्थ 755 अमेरिकी राजनयिकों को देश छोड़ने का आदेश दिया था। पुतिन ने कहा कि अमेरिका में उनके 455 राजनयिक हैं, इसलिए अमेरिका भी रूस में इतने ही राजनयिक रखे। विधेयक पर ट्रंप के हस्ताक्षर होने के फौरन बाद रूस के प्रधानमंत्री दिमित्री मेदवेदेव ने कहा कि इसने दोनों देशों के बीच संबंधों में सुधार की उम्मीद खत्म कर दी है और बेहद अपमानजनक तरीके से टंÑप की कमजोरी सामने आई है। उन्होंने कहा कि इसके नतीजे अमेरिकी प्रशासन को भुगतने होंगे। यह रूस के खिलाफ ‘पूर्ण आर्थिक युद्ध’ का एलान है। मेदवेदेव ने ट्रंप की खिल्ली उड़ाते हुए कहा कि उन्होंने तो अपनी कार्यकारी शक्ति ही कांग्रेस को सौंप दी और लाचारी में गुपचुप दस्तखत कर दिए।
गौरतलब है कि शीतयुद्ध के दौर में दशकों तक अमेरिका और रूस महाशक्ति बने हुए थे और एक-दूसरे के सामने तने रहते थे। लेकिन कुछेक दशक पहले से दुनिया में शक्ति-संतुलन का समीकरण बदला और भू-राजनीति पर कारोबारी सियासत का रंग कुछ ज्यादा ही चढ़ गया। वैश्वीकरण ने सभी को एक कोने से दूसरे कोने में कारोबार करने की छूट दी तो स्वाभाविक ही था कि रूस और अमेरिकी भी करीब आए। लेकिन अमेरिका ने अब जो पाबंदी लगाई है कि उसके हिसाब से अमेरिकी निवेशक रूस की ऊर्जा कंपनियों में निवेश नहीं कर सकते और अमेरिकी कंपनियों का रूस में कारोबार करना आसान नहीं होगा। माना जा रहा है कि यह प्रतिबंध केवल इन्हीं दोनों देशों को प्रभावित नहीं करेगा, बल्कि पूरी दुनिया में इसका असर होगा। जरूरी है कि दोनों देश इस मसले पर पुनर्विचार करेंं। तेज संचार के युग में अब कोई भी फैसला किसी देश-विशेष की सीमा तक नहीं रहता।
संपादकीयः आमने सामने
राष्ट्रपति पद पर डोनाल्ड ट्रंप के आने के बाद अमेरिकी प्रशासन और रूस के राष्ट्रपति ब्लादीमिर पुतिन के बीच जो नजदीकी बनती दिख रही थी वह अब खटास में बदल गई है।
Written by जनसत्ता
Updated:

Jansatta.com पर पढ़े ताज़ा संपादकीय समाचार (Editorial News), लेटेस्ट हिंदी समाचार (Hindi News), बॉलीवुड, खेल, क्रिकेट, राजनीति, धर्म और शिक्षा से जुड़ी हर ख़बर। समय पर अपडेट और हिंदी ब्रेकिंग न्यूज़ के लिए जनसत्ता की हिंदी समाचार ऐप डाउनलोड करके अपने समाचार अनुभव को बेहतर बनाएं ।
First published on: 05-08-2017 at 00:08 IST