चुनाव आयोग ने एक बार फिर अनिवार्य मतदान के विचार को खारिज कर दिया है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त नसीम जैदी ने बुधवार को कहा कि ऐसा कोई भी प्रस्ताव इतने बड़े देश के लिए व्यावहारिक नहीं होगा। साथ ही आयोग ने विधानसभा और लोकसभा चुनाव एक साथ कराने से भी इनकार कर दिया। कहा कि इसमें नौ हजार करोड़ रुपए का खर्च आएगा। पर सबसे बड़ी दिक्कत कानूनी मोर्चे पर है। लोकसभा और सारी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के लिए सर्वसम्मति से संविधान संशोधन करना होगा। हालांकि उन्होंने यह कह कर बहस की गुंजाइश बनाए रखी है कि इस सिलसिले में और विचार आने चाहिए। अनिवार्य मतदान की पहल भाजपा की ही गुजरात सरकार ने की थी। पर याद रहे कि फरवरी में लोकसभा में जब अनिवार्य मतदान पर एक गैरसरकारी विधेयक पेश हुआ, तो उसका जवाब देते हुए खुद तब के कानूनमंत्री डीवी सदानंद गौड़ा ने कहा था कि अनिवार्य मतदान को लागू करना और मतदान न करने वालों को दंडित करना संभव नहीं होगा। विधि आयोग ने मार्च में चुनाव सुधारों पर अपनी रिपोर्ट दी, तो उसमें चुनावी चंदे की पारदर्शिता सुनिश्चित करने सहित अनेक अहम सुझाव थे, पर अनिवार्य मतदान की सिफारिश नहीं थी, बल्कि आयोग ने कई वजहों से इसे अत्यंत अनुपयुक्त बताया। इससे काफी पहले, 2009 में सर्वोच्च अदालत ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए अनिवार्य मतदान की मांग खारिज कर दी थी। अदालत ने कहा था कि ऐसा करना ‘अमानवीय तरीका’ होगा।
दरअसल, हमारे संविधान के मुताबिक मतदान एक मौलिक नागरिक अधिकार है, न कि कर्तव्य। संविधान के इस बुनियादी प्रावधान को कोई राज्य सरकार कैसे बदल सकती है? केंद्र सरकार भी नहीं बदल सकती। अनिवार्य मतदान का प्रावधान शायद संसदीय सर्वसम्मति से किया जा सके, पर वैसी आम सहमति क्या बन पाएगी? और वैसा करना क्या वांछनीय होगा? असल में अनिवार्य मतदान को लेकर हाल के दिनों में बहस इसलिए भी कुछ ज्यादा तेज हुई कि प्रधानमंत्री जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, उसी दौरान राज्य के स्थानीय निकाय चुनावों में अनिवार्य मतदान का विधेयक विधानसभा में पारित हुआ था; इसमें मतदान न करने वालों पर सौ रुपए का जुर्माना लगाने का भी प्रावधान था। लेकिन उच्च न्यायालय ने इस विधेयक पर रोक लगा दी। एक ऐसा विधेयक, जो न तो संविधान-प्रदत्त नागरिक अधिकारों से मेल खाता हो न जन-प्रतिनिधित्व कानून से, वह न्यायिक समीक्षा में कैसे ठहर सकता था? विधि विशेषज्ञ, मानवाधिकार कार्यकर्ता और चुनाव आयोग के कुछ पूर्व और वर्तमान सदस्य भी इस मसले पर बंटे हुए हैं। कुछ विधि विशेषज्ञों का कहना है कि मतदान को अनिवार्य बनाने के बजाय इसे नागरिकों की मूल जरूरत के तौर पर परिभाषित किया जाना चाहिए। लेकिन ज्यादातर मानते हैं कि मतदान को अनिवार्य बनाने का कोई औचित्य नहीं है। अनिवार्य मतदान के पक्ष में प्रमुख दलील यह दी जाती है कि इससे मतदान शत-प्रतिशत होगा, लोकतांत्रिक प्रक्रिया में नागरिक भागीदारी बढ़ेगी और इससे हमारे लोकतंत्र को मजबूती मिलेगी। लेकिन मतदान का प्रतिशत बढ़ने का असल महत्त्व तभी है जब मतदान स्वैच्छिक हो। जब लोकसभा और विधानसभा में यानी सदन में मतदान में शामिल न होने का विकल्प खुला रहता है, तो करोड़ों लोगों पर अनिवार्यता का बंधन क्यों, जो अपने क्रियान्वयन में उत्पीड़नकारी साबित हो सकता है, अव्यावहारिक तो है ही।
संपादकीयः अधिकार बनाम कर्तव्य
चुनाव आयोग ने एक बार फिर अनिवार्य मतदान के विचार को खारिज कर दिया है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त नसीम जैदी ने बुधवार को कहा कि ऐसा कोई भी प्रस्ताव इतने बड़े देश के लिए व्यावहारिक नहीं होगा।
Written by जनसत्ता

Jansatta.com पर पढ़े ताज़ा संपादकीय समाचार (Editorial News), लेटेस्ट हिंदी समाचार (Hindi News), बॉलीवुड, खेल, क्रिकेट, राजनीति, धर्म और शिक्षा से जुड़ी हर ख़बर। समय पर अपडेट और हिंदी ब्रेकिंग न्यूज़ के लिए जनसत्ता की हिंदी समाचार ऐप डाउनलोड करके अपने समाचार अनुभव को बेहतर बनाएं ।
First published on: 21-10-2016 at 02:13 IST