रिजर्व बैंक ने मौद्रिक नीति की द्विमासिक समीक्षा करते हुए नीतिगत ब्याज दरों को यथावत रखा है। बहुत-से लोगों ने आस लगाई थी कि इस बार रिजर्व बैंक रेपो दर को सवा छह फीसद से छह फीसद कर देगा। ऐसी उम्मीद इस वजह से की जा रही थी कि निजी निवेश तथा उद्योगों के लिए ऋण की दर, दोनों में ठहराव दिख रहा है, और रेपो रेट में चौथाई फीसद की कटौती से उनमें गति आ सकती है। लेकिन रिजर्व बैंक ने रेपो रेट को ज्यों का त्यों रखा है, तो इसकी वजहें समझी जा सकती हैं। दरअसल, उसने महंगाई को काबू में रखने के तकाजे को प्राथमिकता दी है। यों खुदरा बाजार में महंगाई की मौजूदा दर लक्ष्य की सीमा में ही है। फिर भी रिजर्व बैंक ने सावधानी बरतना जरूरी समझा है। एक तो इसलिए कि ओपेक यानी तेल निर्यातक देशों के संगठन ने तेल निकासी में कमी का फैसला कर रखा है और इसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें चढ़ने का रुझान है।

तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के फलस्वरूप परिवहन और माल ढुलाई की दरें बढ़ती हैं और इसका नतीजा ढेर सारी वस्तुओं की मूल्यवृद्धि के रूप में आता है। दूसरे, नोटबंदी के चलते मांग में कमी के फलस्वरूप कीमतों में उतार या ठहराव का क्रम अब टूट सकता है। फिर, गैर-खाद्य और गैर-र्इंधन की श्रेणियों में महंगाई की दर सितंबर से 4.9 फीसद बनी रही है। शीतऋतु में अमूमन सब्जियों की कीमतों में राहत रहती है, यह राहत कोई दो महीने बाद समाप्त हो सकती है। इसके अलावा, रिजर्व बैंक मान कर चल रहा है कि सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के क्रियान्वयन का असर अगले वित्तवर्ष में भी दिखेगा। नीतिगत दरों में कोई फेर-फार न करने के पीछे मौद्रिक समीक्षा समिति को कई अनिश्चितताओं का अंदेशा भी रहा होगा। डॉलर और मजबूत हो रहा है, यानी रुपए के मुकाबले उसकी कीमत और चढ़ रही है। अमेरिका की कमान डोनाल्ड ट्रंप के हाथ में आने से वहां संरक्षणवाद की प्रवृत्ति ने जोर पकड़ा है और तमाम देश यह सोच कर चिंतित हैं कि इसका जाने क्या असर होगा। यह भी कयास लगाया जा रहा है कि यूएस फेड यानी अमेरिका का केंद्रीय बैंक ब्याज दरें बढ़ा सकता है। ऐसा हुआ तो विदेशी निवेशक अमेरिका का रुख करने में देर नहीं करेंगे। यों भी कुछ महीनों में भारत में विदेशी निवेश का प्रवाह उलटा चल रहा है।

इन सब बातों के मद््देनजर मौद्रिक समीक्षा समिति ने सर्वसम्मति से जो फैसला किया वह तर्कसंगत ही कहा जाएगा। यह भी गौरतलब है कि सरकार जो कहे, रिजर्व बैंक ने देश की अर्थव्यवस्था पर नोटबंदी के असर को स्वीकार किया है, और इसीलिए उसने मौजूदा वित्तवर्ष में आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान घटा कर 6.9 फीसद कर दिया है। इससे पहले दिसंबर में ही, रिजर्व बैंक ने वृद्धि दर का अपना अनुमान 7.6 फीसद से घटा कर 7.1 फीसद कर दिया था। मजे की बात यह है कि खुद सरकार का अनुमान रिजर्व बैंक के अनुमानित आंकड़े से भी कम है; आर्थिक सर्वे में 2016-17 में वृद्धि दर 6.5 फीसद रहने का अनुमान पेश किया गया है। अलबत्ता रिजर्व बैंक का खयाल है कि अगले वित्तवर्ष में वृद्धि दर सात फीसद के ऊपर रहेगी, इसलिए कि नोटबंदी के चलते जो बंदिशें लगी थीं उनका दौर खत्म हो रहा है, तेरह मार्च से नकद निकासी पर कोई भी सीमा नहीं रहेगी। इससे खुदरा बाजार और माल ढुलाई जैसे जो क्षेत्र ज्यादा से ज्यादा नकदी पर आश्रित हैं, फिर से पटरी पर आ जाएंगे। यह उम्मीद भी अर्थव्यवस्था पर नोटबंदी के बुरे असर को ही प्रतिबिंबित करती है।
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