राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने राजस्थान में गरीबों का मखौल उड़ाने के मामले को उचित ही गंभीरता से लिया है। गौरतलब है कि राज्य के दौसा जिले में बीपीएल यानी गरीबी रेखा से नीचे आने वाले परिवारों के घरों पर लिखा है- ‘मैं गरीब हूं, मैं राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत राशन लेता हूं।’ कोई भी अपनी मर्जी से अपने घर की दीवार पर यह नहीं लिखना चाहेगा। दौसा में हजारों घरों पर यह लिखा मिलेगा, तो समझा जा सकता है कि अधिकारियों के निर्देश पर ही ऐसा हुआ होगा। खबर तो यह भी है कि ये शब्द लिखवाने के लिए बीपीएल परिवारों को कुछ पैसे भी दिए गए थे। ऐसी इबारत हर लिहाज से घोर आपत्तिजनक है। मानवाधिकार आयोग ने इस मामले का स्वत: संज्ञान लिया है और इसका संदेश साफ है कि गरीब आदमी की भी गरिमा है, जिससे खिलवाड़ नहीं किया जाना चाहिए। पीडीएस यानी सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत गरीबों को मिलने वाला राशन कोई खैरात नहीं है। यह राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत उन्हें मिलता है, जो कि उनका अधिकार है। क्या अपने इस अधिकार का इस्तेमाल वे अपमानित होकर ही कर सकते हैं? महीने में दस या पंद्रह किलो गेहूं के लिए अगर दौसा के हजारों परिवारों ने अपने घर की बाहरी दीवार पर गरीब होने की घोषणा लिखवाना मंजूर किया, तो इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि तरक्की के तमाम दावों के बावजूद वे कैसी असहायता की हालत में जी रहे हैं।
फिर, इबारत लिखे जाने से इनकार न कर पाने का एक कारण बाबुओं के नाराज हो जाने का डर भी रहा होगा। कुछ समय पहले एक अंतरराष्ट्रीय संस्था ने ग्लोबल हंगर इंडेक्स यानी विश्व भूख सूचकांक जारी किया था। इस सूचकांक ने बताया कि भारत में भुखमरी के कगार पर जीने वालों और अधपेट सोने को मजबूर लोगों की तादाद सबसे ज्यादा है। अगर गरीबों के साथ अपमानजनक व्यवहार पर कोई अध्ययन हो, तो उसमें भी भारत नंबर एक पर ही दिखेगा। गरीब होने की सूचना घरों पर जबरन पुतवाने की घटना से राजस्थान सरकार की किरकिरी हुई है। मानवाधिकार आयोग के नोटिस से पहले ही वह आलोचना का पात्र बन गई थी। मामले के तूल पकड़ने पर उसने अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ने की कोशिश शुरू कर दी। राज्य के पंचायत मंत्री ने सफाई दी कि ऐसा कोई भी आदेश राज्य सरकार की तरफ से नहीं दिया गया था। पर आदेश के बगैर, संबंधित इबारत लिखवाने की बात कर्मचारियों को कैसे सूझी, और इसके लिए दिए गए पैसे कहां से आए?
दूसरी तरफ राज्य सरकार यह दलील भी देती है कि गरीब होने की घोषणा दीवार पर अंकित करने के पीछे इरादा राशन वितरण में होने वाली हेराफेरी रोकना था। अगर यह बात थी, तो राज्य सरकार निर्णय की जवाबदेही लेने से बच क्यों रही है? लेकिन इसी के साथ दूसरा सवाल यह उठता है कि अनियमितता और गड़बड़ी रोकने का कोई और तरीका उसे क्यों नहीं सूझा? जो हुआ वह गरीबों के अपमान के साथ-साथ सार्वजनिक वितरण प्रणाली का भी मखौल है। आयोग ने राज्य सरकार से चार हफ्तों के भीतर जो स्पष्टीकरण मांगा है उसमें दोषियों पर की गई कार्रवाई का ब्योरा देने को भी कहा है। कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि कार्रवाई सिर्फ दिखावे के लिए होगी, या किसी और का दोष किसी और के सिर मढ़ दिया जाएगा!

