कई दशक से नेपाल की राजनीति राजशाही को उखाड़ने, सत्ता-संघर्ष और अवसरवादी गठजोड़ों के इर्दगिर्द घूमती रही है। इसलिए ‘सहमति का सम्मान’ करते हुए पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ का प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना लीक से थोड़ा हटा हुआ फैसला माना जा रहा है। अपनी पार्टी यानी कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ नेपाल (माओवादी-सेंटर) और नेपाली कांग्रेस के बीच सत्ता साझेदारी को लेकर बनी सहमति के फलस्वरूप वे प्रधानमंत्री पद पर नौ महीने तक रहे। इससे पहले मई, 2009 को भी उन्होंने करीब इतनी ही अवधि तक प्रधानमंत्री रहने के बाद इस्तीफा दिया था, लेकिन तब उन्हें तब के राष्ट्रपति रामबरन यादव से हुए विवाद के कारण पद छोड़ना पड़ा था। फिलहाल, नेपाली राष्ट्रपति विद्यादेवी भंडारी ने नए प्रधानमंत्री चुने जाने तक उन्हें पद पर बने रहने को कहा है।
संभावना जताई जा रही है कि नेपाली कांग्रेस के नेता शेरबहादुर देउबा अगले प्रधानमंत्री होंगे। देउबा और प्रचंड के दलों ने जुलाई 2016 में आपसी समझौता करके तत्कालीन केपी ओली की सरकार गिरा दी थी और बारी-बारी से सरकार बनाने का वादा किया था, जिसका कार्यकाल जनवरी 2018 तक रहेगा। करार में यह भी तय हुआ था कि स्थानीय निकायों के चुनाव तक प्रचंड प्रधानमंत्री रहेंगे। प्रांतीय और राष्ट्रीय असेंबली के चुनाव देउबा के कार्यकाल में होंगे। दो दशक बाद, पिछली 14 मई को स्थानीय निकाय चुनाव का पहला चरण पूरा हो गया, जिसे कि देश में स्थानीय स्तर पर लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। 1997 में स्थानीय स्तर के चुनाव हुए थे। लेकिन बाद में राजशाही और माओवादी विद्रोहियों के बीच ठने सत्ता-संघर्ष में ये चुनाव स्थगित कर दिए गए। प्रचंड ने देश के नाम अपने संबोधन में कहा कि उन्होंने संतुलित विदेश नीति का अनुसरण किया और पड़ोसियों के साथ विश्वास बहाली में सफलता पाई। प्रधानमंत्री के अपने पहले कार्यकाल में प्रचंड का झुकाव चीन की तरफ था, लेकिन अपने दूसरे कार्यकाल में उन्होंने अपना पहला विदेश दौरा चीन के बजाय भारत का किया। स्थानीय निकायों और पंचायतों के चुनाव का दूसरा चरण 14 जून को है।
नेपाली मीडिया ने जहां प्रचंड के इस्तीफे की सराहना की है, वहीं विपक्ष इसकी कड़ी आलोचना कर रहा है। विपक्षी पार्टी सीपीएन (यूएमएल) ने कहा है कि वे सदन में इसका विरोध करेंगे। विपक्ष का कहना है कि दूसरे चरण का मतदान बाकी है और प्रधानमंत्री के इस्तीफा देने के कारण प्रशासनिक ऊहापोह की स्थिति बन गई है। इस बदलाव के बीच अब लोगों की निगाहें अगले प्रधानमंत्री की कार्यप्रणाली और कार्यशैली पर टिकी हैं। प्रचंड के उत्तराधिकारी के सामने सबसे बड़ी चुनौती है नेपाल की अस्थिर राजनीति के बीच अपनी जगह बनाना, स्थिरता का भरोसा दिलाना और जनाकांक्षाओं को पूरा करना। नेपाल से भारत के जितने करीबी रिश्ते रहे हैं उतने किसी और देश के साथ नहीं। पर भारत के दूसरे पड़ोसी देशों की तरह नेपाल में भी पैठ बढ़ाने की चीन की महत्त्वाकांक्षा ने भारत को सशंकित कर रखा है। उम्मीद की जानी चाहिए नेपाल का नया प्रधानमंत्री जो भी होगा, भारत से पुरानी मित्रता के तकाजों का खयाल रखेगा।

