लगभग दो महीने पहले जब सीपीएन (एम-सी) यानी नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी सेंटर) ने वहां की सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा की थी, तभी यह साफ हो गया था कि प्रधानमंत्री केपी ओली अब चंद रोज के लिए अपने पद पर हैं। फिर सीपीएन (एम-सी) के नेता प्रचंड ने नेपाली कांग्रेस और बाद में मधेसी पार्टियों के मोर्चे को भी अपने पक्ष में कर लिया। इसके बाद जब संसद में अविश्वास प्रस्ताव आना तय हो गया, तो ओली को इसके नतीजे का अंदाजा था। शायद इसीलिए उन्होंने अविश्वास प्रस्ताव आने के पहले ही इस्तीफे की घोषणा कर दी। पिछले साल अक्तूबर में प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद यह दूसरी बार था जब ओली के नेतृत्व के सामने इस तरह की चुनौती थी। नेपाल के मौजूदा राजनीतिक संकट के बीच जो विकल्प हैं, उनमें संभावना यही लग रही है कि प्रचंड को प्रधानमंत्री बनने का मौका मिले।

लेकिन इससे पहले दोनों पक्षों की ओर से जिस तरह के आरोप-प्रत्यारोप के दौर चले, वह नेपाल में पिछले कई सालों से चल रही राजनीतिक उठापटक और जद््दोजहद को देखते हुए अप्रत्याशित नहीं लगता है। अविश्वास प्रस्ताव के समर्थन में दिख रही लगभग सभी पार्टियों ने ओली को इस बात के लिए कठघरे में खड़ा किया कि उन्होंने अपने प्रमुख वादों पर अमल नहीं किया। दूसरी ओर, ओली ने इस संकट को नेपाल की आंतरिक खींचतान का नतीजा मानने के बजाय इसके पीछे साजिश की ओर इशारा किया है। नई सरकार बनने और नया संविधान लागू होने के बाद भारत का जो रुख रहा, उसके मद््देनजर ओली ने शायद भारत की ओर इशारा करते हुए कहा कि नेपाल को एक प्रयोगशाला के तौर पर विकसित किया जा रहा है; विदेशी ताकतें साजिश करके संविधान लागू नहीं होने देना चाहती हैं। दरअसल, सत्तापलट के दिखने वाले कारणों का नेपथ्य कई बार इससे अलग भी होता है।

नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता का क्या आलम रहा है उसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि दस साल पहले राजतंत्र की समाप्ति के बाद से नेपाल में यह आठवीं सरकार है। ओली के नेतृत्व में सरकार गठन के बाद देश को जिस तरह के व्यवस्थागत उथल-पुथल का सामना करना पड़ा, उसमें स्वाभाविक रूप से कई सवाल उठे। हालत यह थी कि नए संविधान के लागू होने के बाद नेपाल में मधेसी समुदाय ने अपने अधिकारों के लिए संविधान में संशोधन की मांग को लेकर आंदोलन छेड़ा हुआ था।

पिछले साल के भूकम्प में हुए जानमाल के व्यापक नुकसान से जूझते नेपाल की राजनीतिक अस्थिरता का असर आम जनता के जीवन पर क्या पड़ रहा होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। इसी बीच कई महीनों तक चले मधेसियों के विरोध-प्रदर्शन के दौरान पुलिस के साथ झड़प में पचास से ज्यादा लोग मारे गए थे और उसकी वजह से नेपाल में जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति ठप पड़ गई थी। नेपाल में इस मधेसी संकट के लिए भारत को जिम्मेदार माना गया। जाहिर है, दोनों देशों के बीच संबंधों के बुरे दौर में ऐसे संकट के लिए भारत की ओर उंगली उठना समस्या को और बढ़ाने में ही मददगार बना। नेपाल फिलहाल जिस दौर से गुजर रहा है उसमें नई सरकार जिसके भी नेतृत्व में बने, उसकी स्थिरता को लेकर आशंका बनी रहेगी।