राष्ट्रीय सीमाओं की रक्षा यों भी एक बहुत चुनौती भरा दायित्व है। दिन-रात ऐसी जगह तैनात रहना पड़ता है जहां कभी भी हिंसक झड़प या गोलाबारी हो सकती है। फिर, सरहद पर तैनात बहुत-से फौजियों को दुर्गम क्षेत्रों में रहना पड़ता है जहां रिहाइशी इलाकों में आसानी से मिल सकने वाली बहुत-सी सुविधाएं नहीं होतीं। एक तरफ जिंदगी को जोखिम में डाल कर की जाने वाली ड्यूटी, और दूसरी तरफ कई मुश्किलात भी। हाल में सोशल मीडिया पर आए बीएसएफ के एक जवान के वीडियो ने यह भी बताया कि उन्हें खाने को जो मिलता है उसमें कैसी कोताही की जाती है। पर सैनिकों को जिन खतरों का सामना करना पड़ता है उनमें एक बड़ा खतरा कुदरती भी है। कहीं-कहीं तो यही सबसे बड़ा खतरा है, जैसे कि सियाचिन में, जिसे दुनिया का सबसे ऊंचा रणक्षेत्र कहा जाता है। सियाचिन जितना भले न हो, पर सरहद से लगे कुछ अन्य क्षेत्रों में भी, प्रकृति या मौसम की मार झेलते हुए सैनिकों को अपनी ड्यूटी करनी पड़ती है। यहां तक कि कई बार मौसम जानलेवा भी साबित होता है।

कश्मीर के गुरेज सेक्टर में सैनिक शिविरों और सेना के गश्ती दल पर हुए हिमस्खलन से दो दिन में पंद्रह सैनिकों समेत इक्कीस लोगों की जान चली गई। इस हादसे ने देशवासियों को एक बार फिर याद दिलाया है कि हमारे सैनिक किन हालात में अपनी ड्यूटी करते हैं। सेना ने तुरंत राहत और बचाव का काम आरंभ किया जिसके फलस्वरूप कई जवानों को हिमस्खलन और बर्फबारी की भेंट चढ़ जाने से बचा लिया गया। कई लापता जवानों की तलाश जारी है। कुदरती आपदा से सैनिकों की जान जाने के ऐसे जाने कितने वाकये हो चुके हैं। वर्ष 2012 में गुरेज सेक्टर में ही बर्फीले तूफान की वजह से पांच सैन्य अफसरों समेत बीस सैनिकों की मौत हुई थी। पिछले ही साल, फरवरी में हिमस्खलन की चपेट में आ जाने से 19 मद्रास रेजीमेंट के दस जवानों की मौत हो गई थी। लांसनायक हनुमनथप्पा को कई दिन बर्फ में दबे रहने के बाद बाहर निकाला गया था। हिमालय के ऊंचे इलाकों में, खासकर इस मौसम में, हिमस्खलन आम बात है। इन्हीं दिनों हिमाचल में भी भारी बर्फबारी होने की खबर है। विडंबना यह है कि इस साल बर्फबारी कम होने की आशंका जताई जा रही थी। मगर सर्दी के उत्तरार्ध में बर्फबारी और हिमस्खलन का क्रम तेज हो गया। क्या यह जलवायु संकट के दौर में मौसम में तीव्र उतार-चढ़ाव का ही एक और प्रमाण है?

जो हो, हम अपने जवानों की बहादुरी के गीत गाकर ही न रह जाएं, यह भी सोचें कि कश्मीर के गुरेज सेक्टर में जैसा हादसा हुआ, क्या वह एक अपरिहार्य नियति है, या उससे बचा जा सकता है? जब ऊंची पहाड़ियों पर ज्यादा बर्फ जम जाती है तो परतें खिसकने लगती हैं और वे तेज बहाव की तरह नीचे आती हैं। हिमस्खलन और बर्फबारी ऐसी कुदरती घटनाएं हैं जिनके बारे में पूर्वानुमान लगाया जा सकता है, लगाया जाता भी है। पर यह अफसोस की बात है कि इसके मद््देनजर, कश्मीर के सरहदी इलाकों में सैनिक शिविरों में रहने वाले तथा नियंत्रण रेखा पर गश्त करने वाले सैनिकों के लिए, पर्याप्त चेतावनी प्रणाली विकसित नहीं की जा सकी है। जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल एनएन वोहरा ने अपने शोक-संदेश में जहां सैनिकों के जज्बे को सलाम किया है, वहीं ऐसी चेतावनी प्रणाली न होने पर अफसोस भी जताया है। क्या यह उम्मीद की जाए कि यह कमी जल्दी ही दूर कर दी जाएगी!