फ्रांस से राफेल लड़ाकू विमान खरीदने पर भारतीय वायु सेना की ताकत निस्संदेह कुछ बढ़ेगी। पिछले सोलह सालों से वायु सेना नए जंगी जहाजों की मांग कर रही थी। इसके लिए यूपीए सरकार के समय राफेल विमानों की खरीद की पहल हुई थी, मगर वह सौदा खटाई में पड़ गया। नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले साल छत्तीस राफेल विमान खरीदने का एलान किया और अब फ्रांस सरकार के साथ उसका सौदा हो गया है। राफेल अत्याधुनिक तकनीक से लैस विमान हैं। इनकी मारक क्षमता साढ़े तीन हजार किलोमीटर तक है। ऐसे जंगी जहाज फिलहाल न तो चीन के पास हैं और न पाकिस्तान के। इसलिए पिछले कुछ समय से इन दोनों देशों के साथ बढ़ते तनाव को देखते हुए माना जा रहा है कि भारतीय वायु सेना कुछ ताकतवर महसूस करेगी।

हालांकि भारत के जंगी बेड़े में जहाजों की कमी को देखते हुए महज छत्तीस विमानों की खरीद से काम नहीं बनने वाला। सोलह साल पहले वायु सेना ने एक सौ छब्बीस नए लड़ाकू विमानों की मांग की थी। उसके तहत अठारह राफेल विमान खरीदने और बाकी विमानों को देश में ही तैयार करने की पहल हुई थी। वह सौदा खटाई में पड़ने के बाद देर होती गई। इस बीच मिग 21 विमानों के उपयोग पर पाबंदी लगा दी गई है। मिग 21 और 27 लड़ाकू विमान पुराने होने की वजह से इनके ग्यारह स्क्वाड्रन रिटायर हो रहे हैं। एक स्क्वाड्रन में सोलह से अठारह विमान होते हैं। फिलहाल भारतीय वायु सेना को बयालीस से पैंतालीस स्क्वाड्रन की जरूरत है, जिसमें फिलहाल बत्तीस स्क्वाड्रन हैं। कुछ विमानों के पुराने पड़ जाने की वजह से यह जरूरत और बढ़ गई है।

फिलहाल भारतीय वायु सेना के पास मौजूदा लड़ाकू विमानों में से सुखोई 30 एमकेआइ और जगुआर बेड़े के विमानों की सेवाएं संतोषजनक नहीं हैं। सुखोई की पांचवीं पीढ़ी के विमानों के लिए भारत और रूस के बीच अभी सौदे की पहल नहीं हो पाई है। स्वदेशी तेजस विमानों को तैयार करने में वक्त लग रहा है। ये विमान दो साल बाद सेना को मिल सकेंगे। फिर 2026 तक इसके सौ उन्नत संस्करण तैयार किए जाएंगे। ऐसे में राफेल विमानों के आने से वायु सेना कुछ राहत महसूस करेगी। राफेल विमान अगले तीन सालों में भारत के जंगी बेड़े में शामिल हो जाएंगे। तब तक सरकार फ्रांस से कुछ राफेल विमान पट््टे पर लेना चाहती है, ताकि भारतीय वायु सेना उन पर अभ्यास कर सके।

अच्छी बात है कि इसके लिए भारत सरकार ने सीधे कंपनी से बात न करके फ्रांसीसी सरकार के जरिए सौदा किया। इससे सैन्य साजो-सामान की खरीद में अनियमितताओं के आरोपों से बचा जा सकेगा। इस तरह इन विमानों की कीमत भी कुछ कम हो गई है। मगर राफेल विमानों की कीमत फिर भी दूसरी कंपनियों के विमानों की तुलना में अधिक है और इनका रखरखाव खासा महंगा है। ऐसे में जब तक स्वदेशी तेजस विमानों की खेप बन कर तैयार नहीं हो जाती, भारत को विदेशी कंपनियों के विमानों पर आश्रित रहना पड़ेगा। सीमाओं पर तनाव और युद्ध की स्थिति में दिनों-दिन वायु सेना का महत्त्व बढ़ता गया है। अब लड़ाइयां जमीन से जमीन के बजाय आसमान के जरिए ज्यादा कामयाब मानी जाती हैं। ऐसे में भारतीय वायु सेना को अत्याधुनिक जंगी साजो-सामान से लैस करना सरकार की प्राथमिकता बन गई है। उस दिशा में यह एक अच्छा कदम माना जाना चाहिए।