लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी का एक प्रमुख वादा गंगा के निर्मलीकरण का था। इसलिए स्वाभाविक ही मोदी सरकार के महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रमों में इसे जगह मिली। पर अब तक इस दिशा में जुबानी जमाखर्च के अलावा कुछ खास नहीं हो पाया था। लेकिन गुरुवार को केंद्र ने नमामि गंगे कार्यक्रम की शुरुआत कर दी। काफी धूम-धड़ाके के साथ। नमामि गंगे पूरी तरह केंद्रीय वित्त-पोषित है और इसे लेकर सरकार के उत्साह का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि इस कार्यक्रम के तहत एक साथ कई राज्यों में कुल दो सौ इकतीस परियोजनाएं शुरू की गई हैं। कार्यक्रम की शुरुआत के अवसर पर जल संसाधन, नदी संरक्षण एवं गंगा मंत्री उमा भारती समेत कई केंद्रीय मंत्रियों ने भी शिरकत की। इसमें दो राय नहीं कि सात जुलाई 2016 को भारत में पर्यावरण की दृष्टि से एक ऐतिहासिक दिन के रूप में याद किया जाएगा, जिस दिन गंगा के निर्मलीकरण का अब तक का सबसे बड़ा अभियान शुरू हुआ।
अगर यह अपनी तार्किक परिणति तक पहुंचे तो इससे अच्छी बात और क्या होगी! गंगा की सफाई की पहली बड़ी पहल राजीव गांधी की सरकार ने की थी। तब शुरू हुए गंगा स्वच्छता कार्यक्रम पर हजारों करोड़ रुपए बहाए गए, पर गंगा में प्रदूषण कम न हुआ। यूपीए सरकार ने गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया और गंगा बेसिन प्राधिकरण गठित किया, पर गंगा की हालत पहले जैसी ही शोचनीय बनी रही। अनियमितता, क्रियान्वयन में ढिलाई और जवाबदेही का अभाव, इन योजनाओं की कुछ खास कमजोरियां रहीं। हजारों करोड़ रुपए खर्च हुए, पर किसी को जवाबदेह नहीं ठहराया गया। उम्मीद की जानी चाहिए कि मोदी सरकार ने इन अनुभवों से कुछ सबक लिया होगा, और वह नमामि गंगे का वैसा हाल नहीं होने देगी जैसा पिछली योजनाओं का हुआ।
नमामि गंगे के तहत शामिल परियोजनाएं मोटे तौर पर दो तरह की हैं। एक, गंगा को प्रदूषण से बचाने की। दो, गंगा से जुड़े विकास-कार्यों की। गंगा मेंप्रदूषण का कारण मुख्य रूप से जल-मल और औद्योगिक ठोस व तरल अपशिष्टों को गिराया जाना रहा है। इसे रोकने के लिए गंगाघाटी वाले राज्यों यानी उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल की सरकारों तथा गंगातटीय शहरों के नगर निगमों का सहयोग जरूरी होगा। विकास-कार्यक्रमों में गंगा किनारे के चार सौ गांवों को गंगा-ग्राम के तौर पर विकसित किया जाएगा; तेरह आइआइटी ने पांच-पांच गांवों के विकास का जिम्मा लिया है। गंगा घाटों के आधुनिकीकरण व सुंदरीकरण के अलावा वाराणसी से हल्दिया के बीच सोलह सौ बीस किलोमीटर के गंगा-मार्ग में स्टीमर या छोटे जहाज चलेंगे और इसके लिए कई जगह बंदरगाह बनाने की योजना है।
इस तरह नमामि गंगे कार्यक्रम केवल प्रदूषण-मुक्ति कार्यक्रम नहीं है, इसमें बहुत कुछ शामिल है। पर कोई भी बड़ी नदी अपने में काफी नहीं होती, अपनी सहायक नदियों के साथ ही पूर्ण होती है। लिहाजा, गंगा का गौरव लौटाना है तो उसकी सहायक नदियों की भी सुध लेनी होगी। फिर, प्रदूषण-मुक्ति के अलावा एक बड़ा मसला गंगा की अविरलता का रहा है। पर्यावरणविद मानते हैं कि गंगा की प्रदूषण-मुक्ति को गंगा की अविरलता के तकाजे से अलग करके नहीं देखा जा सकता। लेकिन बड़े-बड़े बांधों की वजह से यह अविरलता बाधित हुई है। मोदी सरकार ने इस पर चुप्पी साध रखी है, जबकि दावे के मुताबिक नमामि गंगे सिर्फ गंगा-सफाई की नहीं, बल्कि गंगा के संरक्षण की योजना भी है। फिर, एक मसला यह है कि नदी-निर्मलीकरण योजना एक-दो नदियों तक सीमित न रहे, सभी नदियों की सुध ली जाए।

