आर्थिक अपराधों के भगोड़ों की संपत्ति जब्त करने के लिए ज्यादा सख्त कानून बनाने का केंद्र सरकार का प्रस्ताव स्वागत-योग्य है। यों वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कुछ महीने पहले ही इस बारे में संकेत दे दिया था, पर अब सरकार ने प्रस्तावित कानून का मसविदा भी लगभग तैयार कर लिया है। मसविदे के मुताबिक भगोड़े आर्थिक अपराधी से तात्पर्य है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आर्थिक अपराध में गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया है और वह व्यक्ति देश छोड़ कर चला गया है तथा आपराधिक अभियोजन का सामना करने के लिए भारत आने से इनकार कर रहा है। कहना न होगा कि प्रस्तावितकानून की प्रेरणा विजय माल्या के चर्चित मामले में हुए अनुभव से मिली। माल्या कोई साल भर से ब्रिटेन में रह रहा है और उस पर बैंकों का नौ हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का बकाया है। उसे भारत लाने की सारी कोशिशें नाकाम रही हैं। इस तरह के और भी उदाहरण हैं। मसलन, आइपीएल का पूर्व आयुक्त ललित मोदी भी देश से बाहर छिपा हुआ है जिस पर कई घपलों को अंजाम देने का आरोप है। ऐसे लोग बड़े शातिर होते हैं। अपने खिलाफ कानूनी प्रक्रिया की भनक मिलते ही देश से बाहर भाग जाते हैं ताकि कानून के शिकंजे से बचे रहें। उनके भाग जाने से जांच की प्रक्रिया बुरी तरह बाधित होती है और बैंक अपनी रकम डूब जाने के अंदेशे से हतोत्साह होते हैं। उन्हें कानून की गिरफ्त में लाने के लिए रेड कार्नर नोटिस जारी करवाने, इंटरपोल की मदद लेने या संबंधित देश को प्रत्यर्पण के लिए मनाने जैसी कवायदें करनी पड़ती हैं।
पर माल्या हो या ललित मोदी, व्यवस्था के भीतर सेंध लगाना, नियम-कायदों को ठेंगा दिखाना और रसूख वाले लोगों की मेहरबानी हासिल करना उन्हें आता है। आखिर माल्या ने इतनी बड़ी धनराशि बैंकों से बतौर कर्ज कैसे हासिल कर ली? यही नहीं, ये लोग विदेश में भी अपने मददगार और सरपरस्त ढूंढ़ लेते हैं। यही कारण है कि उन्हें दबोचना आसान नहीं होता। देश के भीतर उनकी संपत्ति को जब्त करना उनके खिलाफ कार्रवाई का एक कारगर तरीका है। लेकिन मौजूदा नियमों में, यह तभी हो सकता है जब जांच एजेंसियां जांच पूरी कर चुकी हों, जिसमें अमूमन दो साल से ज्यादा का वक्त लगता है, और जब्ती की खातिर अदालती आदेश भी निकल चुका हो। फिर, अस्थायी जब्ती भी अधिक से अधिक छह महीने के लिए हो सकती है।
केंद्र सरकार चाहती है कि जांच के प्रारंभ में ही उसे जब्ती का अधिकार हो, और एक समय-सीमा के बाद वह संबंधित संपत्ति को नीलाम भी कर सके। निश्चय ही इससे कानून का भय पैदा होगा और आर्थिक अपराधी बाहर का रुख करने से बाज आएंगे। प्रस्तावित कानून को व्यावहारिक बनाने के लिए सरकार को धनशोधन निरोधक अधिनियम, आय कर अधिनियम और दिवालिया कानून जैसे कई कानूनों में संशोधन भी करने होंगे। लेकिन अगर कड़ाई से अमल की इच्छाशक्ति न हो तो कानून का सख्त होना काफी नहीं है। बैंक छोटे से छोटा कर्ज भी वापसी की संभावना का हर तरह से आकलन कर लेने के बाद ही देते हैं। बड़ी कर्जराशि में तो और भी सावधानी बरती जाती होगी। फिर, साल-दर-साल एनपीए क्यों बढ़ता गया है, जिसके लिए करोड़ों के बकाएदार जिम्मेवार हैं। पर क्या सरकारी बैंकों के आला अफसरों, रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय की कोई जवाबदेही नहीं बनती!

