गुरुवार को अफगानिस्तान के दक्षिणी प्रांत हेलमंड में कार-बम के जरिए किए गए विस्फोट ने करीब तीस लोगों की जान ले ली और पचास से ज्यादा लोग घायल हो गए। इस घटना से एक बार फिर यही जाहिर हुआ है कि तालिबान की हुकूमत के खात्मे के इतने बरस बाद भी अफगानिस्तान हर वक्त आतंक के साए में जी रहा है। गुरुवार को धमाका हेलमंड के लश्करगाह में एक बैंक के बाहर हुआ, जहां सरकारी कर्मचारी अपना वेतन लेने के लिए जमा हुए थे। यों बैंक पर चौबीसों घंटे पहरा रहता ही है, वेतन-वितरण के वक्त सुरक्षा का इंतजाम और बढ़ा हुआ था। हमले की योजना बनाने वालों ने यही वक्त शायद इसीलिए चुना होगा कि वे सरकारी कर्मचारियों और सुरक्षाकर्मियों, दोनों को एक साथ निशाना बनाना चाहते रहे होंगे। इस हमले की जिम्मेदारी लेने का फौरन किसी संगठन का बयान नहीं आया। पर सारे अनुमान यही हैं कि इसके पीछे तालिबान का हाथ होगा, जिसने अफगानिस्तान में दहशतगर्दी की अनगिनत वारदातें की हैं और इनमें बैंक के बाहर किए गए धमाके भी शामिल हैं। पिछले तीन साल में बैंक के बाहर तीन धमाके हो चुके हैं। पहले दो हमलों का जिम्मा तालिबान ने लिया था। इस बार भी शक की सुई उसी की तरफ है। तालिबानी हुकूमत समाप्त होने के इतने साल बाद भी अफगानिस्तान में सुरक्षा की समस्या इतनी विकट क्यों है। यह सवाल इस तथ्य के मद््देनजर और भी गंभीर हो जाता है कि पिछले दिनों आतंकी वारदातों में तेजी आई है।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस साल एक मार्च से इकतीस मई के बीच सुरक्षा के लिहाज से चिंताजनक 6,252 घटनाएं दर्ज की गर्इं। पिछले साल की इसी अवधि से तुलना करें तो ऐसी घटनाओं में दो फीसद की बढ़ोतरी हुई है। पर पूर्वी और दक्षिणी इलाकों में हालत और भी खराब है, जहां इसी अवधि में ऐसी घटनाओं में बाईस फीसद की वृद्धि हुई। ऐसी हालत क्यों है, जबकि पुलिस समेत अफगानिस्तान का अपना सुरक्षा बल खड़ा किया जा चुका है और उन्हें प्रशिक्षित करने तथा आतंक-विरोधी अभियान में मदद करने के लिए अमेरिका के आठ हजार से ज्यादा सैनिक अब भी मौजूद हैं। क्या अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों को वापस बुलाने का ओबामा का फैसला जल्दबाजी भरा कदम था? उनके उत्तराधिकारी डोनाल्ड ट्रंप ने हाल के आतंकी हमलों का हवाला देते हुए अमेरिकी सैनिकी की तैनाती बढ़ाने का इरादा जताया है। कई अन्य नाटो-सदस्य देशों ने भी ऐसे संकेत दिए हैं। लेकिन कई विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ सैनिकों की तैनाती बढ़ाने से तालिबान से पार नहीं पाया जा सकता।

दरअसल, नाटो सैनिकों को एक पराए देश में, पराए परिवेश में मोर्चा संभालना पड़ता है जहां के भूगोल व भाषा से वे परिचित नहीं हैं। जबकि तालिबान चप्पे-चप्पे से वाकिफ हैं और आबादी वाले कई इलाकों पर उनकी पकड़ भी है। अफगान सरकार राजधानी काबुल के अलावा प्रांतीय राजधानियों तथा मुख्य मार्गों पर काबिज है, पर तालिबान दूरदराज के इलाकों में अपनी मर्जी से विचरण करते हैं और जब चाहे हमला भी कर बैठते हैं। यह हैरत की बात है कि नाटो की मदद के बावजूद उनके षड्यंत्रों की खुफिया सूचनाएं अक्सर क्यों नहीं मिल पाती हैं। हाल के तालिबान के हमलों ने एक बार फिर अफगानिस्तान में सुरक्षा-प्रबंध की समीक्षा करने तथा नए सिरे से रणनीति बनाने की जरूरत रेखांकित की है।