हाल ही में तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा की तवांग यात्रा को लेकर चीन ने तीखी आपत्ति जताई थी और यहां तक कहा था कि इससे द्विपक्षीय संबंधों को ‘गंभीर क्षति’ हो सकती है। बुधवार को जिस तरह चीन ने अरुणाचल प्रदेश की छह जगहों के लिए ‘मानकीकृत’ और ‘आधिकारिक’ नामों का एलान किया और इस कदम के ‘वैध’ होने की घोषणा की, उससे साफ है कि अब उसने शायद सोच-समझ कर उकसावे की कार्रवाई शुरू कर दी है। नामों की घोषणा अगर फिलहाल केवल खबर के स्तर पर है तो भी यह भारत की संप्रभुता में चीन के अनधिकार दखल की कोशिश है। खबरें यह भी हैं कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने चीनी सेना के युद्ध के लिए तैयार होने की भी बात कही है। क्या यह बिना किसी ठोस आधार के भारत को उकसाने की कोशिश नहीं है? गौरतलब है कि भारत और चीन की सीमा पर 3488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर लंबे समय से विवाद बना हुआ है। इसे सुलझाने के मकसद से दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों की उन्नीस दौर की बातचीत हो चुकी है। लेकिन अब तक किसी नतीजे पर पहुंचे बिना चीन ने एक बार फिर अरुणाचल प्रदेश को ‘दक्षिण तिब्बत’ बताना शुरू कर दिया है। भारत ने हमेशा की तरह चीन के इस दावे पर तीखी आपत्ति दर्ज कराई है।
चीन अपने अहं और जिद की तुष्टि के लिए भारत को निशाना बनाना चाहता है और उसके लिए दलाई लामा की अरुणाचल यात्रा को बहाना बनाता है! 1959 से ही भारत में रह रहे दलाई लामा इससे पहले भी पांच बार तवांग जा चुके हैं। दलाई लामा को लेकर चीन का विरोध नया नहीं है। हालांकि भारत ने उन्हें इस हिदायत के साथ ही हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में शरण दी हुई है कि वे किसी भी तरह की राजनीतिक गतिविधि में शामिल नहीं होंगे। लेकिन चीन को यह बात चुभती रही है कि दलाई लामा अक्सर तिब्बत की आजादी या स्वायत्तता का सवाल उठाते रहे हैं। यही वजह है कि चीन ने उन्हें और भारत में उनकी गतिविधियों को हमेशा शक की नजर से देखा है।
तवांग को भारत-चीन सीमा के पूर्वी क्षेत्र के सामरिक और राजनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण और संवेदनशील इलाके के तौर पर जाना जाता है। करीब डेढ़ महीने पहले चीन के एक पूर्व वरिष्ठ राजनयिक दाई बिंगुओ ने संकेत दिया था कि अगर भारत अरुणाचल के तवांग क्षेत्र से समझौता कर ले तो चीन उसे अक्साई चिन में रियायत दे सकता है। तवांग मठ तिब्बत और भारत के बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए खास महत्त्व रखता है और वहां के लोग भारत से गहरी आत्मीयता रखते हैं। जाहिर है, तवांग पर भारत के लिए समझौता करने का कोई औचित्य नहीं हो सकता। जबकि इस पर चीन का अधिकार तिब्बती बौद्ध केंद्रों पर उसके नियंत्रण को मजबूत कर सकता है। यही वजह है कि चीन काफी समय से इस मसले पर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश करता रहा है। अरुणाचल प्रदेश की छह जगहों के लिए अपनी मर्जी से नामकरण उसी की एक कड़ी है। और भारत इस पर सख्त रवैया अख्तियार करता है तो यह स्वाभाविक ही होगा।
