हमारे देश में राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के सार्वजनिक स्थलों पर गायन का दायरा क्या हो और वह किसके लिए सहज या असहज है, इस सवाल पर कई बार बेवजह विवाद उठे हैं। लेकिन इलाहाबद हाईकोर्ट ने बुधवार को दिए अपने एक आदेश में साफ कह दिया है कि उत्तर प्रदेश के सभी विद्यालयों में राष्ट्रगान गाना अनिवार्य है। अदालत ने कहा है कि राष्ट्रगान गाना इस देश के प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक दायित्व है। कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश में जब राज्य सरकार ने सभी मदरसों में पूरी औपचारिकता के साथ राष्ट्रगान के गायन का आदेश जारी किया तो उस पर कुछ हलकों से आपत्ति दर्ज की गई। यह दलील दी गई कि देश के प्रति आस्था दर्शाने के लिए शिक्षा ग्रहण करने वाले विद्यार्थियों को राष्ट्रगान गाने पर मजबूर नहीं किया जाए। इसे मदरसे में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की धार्मिक आस्था और विश्वास के विपरीत भी बताया गया। इस मसले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर करके यह मांग की गई थी कि मदरसों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को राष्ट्रगान के गायन से छूट दी जाए।

किसी भी देश का राष्ट्रगान उस देश के प्रति सम्मान को दर्शाने का एक तरीका होता है। हमारे देश में राष्ट्रगान को राष्ट्रीय अखंडता, धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक भावना का प्रसार करने के तौर पर देखा जाता रहा है। इसकी अहमियत इसलिए भी ज्यादा है कि हमारा मौजूदा राष्ट्रगान स्वतंत्रता को हासिल करने का जरिया बना था। आजादी के बाद राष्ट्रगान और राष्ट्रीय ध्वज, तिरंगा फहराना सभी शिक्षण संस्थाओं और अन्य सरकारी संस्थानों में अनिवार्य बना। ऐसी स्थिति में मदरसों को इससे छूट देने की कोई तुक नहीं रह जाती है। अदालत ने भी यह कहा है कि याचिकाकर्ता कोई भी ऐसा तथ्य बताने में नाकाम रहे, जिससे यह साबित हो कि राष्ट्रगान गाने से किसी की धार्मिक आस्था और विश्वास पर कोई प्रभाव पड़ेगा। गौरतलब है कि पिछले दिनों जब उत्तर प्रदेश में मदरसों में राष्ट्रगान के गायन से संबंधित आदेश जारी हुआ तो ऐसी तमाम खबरें भी आर्इं, जहां बड़ी तादाद में मदरसों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों और शिक्षकों ने सामूहिक रूप से पूरे उत्साह के साथ लहराते राष्ट्रीय ध्वज के साथ राष्ट्रगान का गायन किया।

लेकिन विरोधी स्वर भी जहां-तहां सुनाई पड़े। अब जबकि अदालत ने इस मामले में दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया है तो निश्चित रूप से इसे लेकर किसी के मन में कोई भ्रम नहीं होना चाहिए। दरअसल, आम लोग देश के प्रति अपनी भावनाएं जाहिर करने को लेकर पूरी तरह सहज रहते हैं। लेकिन कई बार निहित स्वार्थी तत्त्व इस तरह के मामलों को विवादित बना देने में ही अपनी शान समझते हैं। साधारण लोगों को उससे शायद ही कोई मतलब होता हो लेकिन विवाद की स्थिति में अक्सर उन पर भी उंगलियां उठने लगती हैं। इस बात से शायद ही किसी को आपत्ति हो कि देश के प्रति भावनात्मक अभिव्यक्तियां अगर बिना किसी विवाद और दबाव के सामने आएं तो अपने असर में वे स्थायी नतीजे देने वाली होंगी और उससे आखिर देश को ताकत मिलेगी।