उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले में ट्रेन की चपेट में आने से तेरह स्कूली बच्चों की मौत दहला देने वाली घटना है। यह हादसा तब हुआ जब इन बच्चों को ले जा रहा स्कूली वाहन मानव-रहित रेलवे फाटक पर सीवान से गोरखपुर जाने वाली पैसेंजर ट्रेन से टकरा गया। तेरह बच्चों की मौत के अलावा, दस बच्चे और वाहन का चालक घायल हुए हैं। यह दर्दनाक हादसा चूक और घोर लापरवाही का प्रमाण है। इससे यह भी पता चलता है कि मानव-रहित रेलवे फाटक कितने खतरनाक साबित हो रहे हैं। ऐसे फाटकों पर अब तक जो भयानक हादसे हुए हैं, उनसे हमने कोई सबक नहीं लिया और इसी का नतीजा हुआ कि एक बार फिर बड़ा हादसा हुआ और तेरह मासूमों को जान गंवानी पड़ी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने इस बात की तसदीक की है कि यह हादसा स्कूल वाहन चलाने वाले की लापरवाही से हुआ। चालक ने हादसे के वक्त ईयर फोन लगा रखा था। इस मानव-रहित रेलवे फाटक पर तैनात गेट-मित्र ने उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं माना और पटरी पर पहुंचते ही वाहन बंद हो गया। तभी ट्रेन ने इसे चपेट में ले लिया।

यह भयानक हादसा बताता है कि रेलवे प्रशासन और राज्य प्रशासन किस कदर अपनी जिम्मेदारियों से आंखें मूंदें बैठे हैं। जुलाई 2016 में वाराणसी-इलाहाबाद रेलखंड पर एक मानव-रहित रेलवे फाटक पर स्कूली बच्चों से भरी गाड़ी ट्रेन की चपेट में आ गई थी। इस हादसे में दस बच्चे मारे गए थे और कई घायल हो गए थे। तब भी सवाल उठा था कि इन मानव-रहित फाटकों पर कर्मचारी क्यों नहीं तैनात किए जा रहे? रेलमंत्री ने पिछले दिसंबर में राज्यसभा में बताया था कि अगले साल यानी 2018 में गणेश चतुर्थी तक सभी मानव-रहित फाटकों को खत्म कर दिया जाएगा। लेकिन मानव-रहित रेलवे फाटकों पर आए दिन जिस तरह हादसे हो रहे हैं, उससे रेलवे प्रशासन के दावे और वादे सवालों के घेरे में हैं।

देश भर में दस हजार से ज्यादा ऐसे रेलवे फाटक हैं जहां कोई कर्मचारी तैनात नहीं है। वर्ष 2012 में अनिल काकोदकर समिति ने भी पांच साल के भीतरसभी मानव-रहित फाटकों को हटाने को कहा था। ऐसे हादसों से निपटने के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने उपग्रह आधारित चिप प्रणाली विकसित की है, जो मानव-रहित रेल फाटकों पर लोगों को आगाह करेगी। फाटक से करीब पांच सौ मीटर पहले हूटर बजने लगेगा और फाटक के नजदीक लोग सचेत हो जाएंगे। लेकिन रेलवे इसे कब से इस्तेमाल करेगा, कोई नहीं जानता।

कुशीनगर में जो हादसा हुआ, वह राज्य सरकार पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। इस घटना ने स्कूली बच्चों की सुरक्षा की पोल खोल दी है। लगता है प्रदेश में स्कूल सुरक्षा मानकों को ठेंगा बता रहे हैं। वरना स्कूल क्या ऐसे लापरवाह ड्राइवर को रखता, जो गेट मित्र के मना करने के बाद भी फाटक पार करने लगा और हादसे को न्योता दे बैठा। ज्यादातर छोटे शहरों और कस्बों में जहां से रेलवे लाइनें गुजरती हैं, वहां सुरक्षा के लिहाज से कोई बंदोबस्त देखने में नहीं आते। ऐसे में क्या यह राज्य सरकार की जिम्मेदारी नहीं है कि वह इन जगहों की पहचान करवा कर ऐसे फाटकों पर अपने स्तर पर सुरक्षाकर्मियों की तैनाती करे? रेलवे और राज्य सरकार, दोनों अपनी जवाबदेही से पल्ला नहीं झाड़ सकते।