जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे और अमेरिका के निवर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा का एक साथ पर्ल हार्बर की यात्रा करना, अपने-अपने देश की जनता के साथ ही सारी दुनिया के लिए भी एक अहम संदेश है। यह संदेश है, सुलह की शक्ति का। अतीत की कटुता भुला कर शांति और सौहार्द भरे रिश्ते का। इतिहास को नई दिशा देने का। पर्ल हार्बर अमेरिका के हवाई द्वीप में उसका प्रसिद्ध बंदरगाह और नौसैनिक अड््डा है। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, 7 दिसंबर 1941 को, जब वाशिंगटन में जापानी प्रतिनिधि के साथ समझौता वार्ता चल रही थी, उसी समय जापान के लड़ाकू विमानों ने पर्ल हार्बर पर अचानक हमला कर दिया।
इससे अमेरिका का नौसैनिक अड्डा और बंदरगाह तबाह हो गए और उसके ढाई हजार सैनिक मारे गए। हालांकि साल के भीतर ही अमेरिका ने अपने इस नौसैनिक अड््डे का पुनर्निर्माण कर लिया, मगर पर्ल हार्बर दूसरे विश्वयुद्ध का एक नया मोड़ साबित हुआ। इस हमले से पहले अमेरिका की विश्वयुद्ध में सीधी भागीदारी नहीं थी, उसकी भूमिका ‘मित्र देशों’ को आर्थिक व हथियारी मदद करने और इससे कारोबारी फायदा उठाने तक सीमित थी। लेकिन पर्ल हार्बर परहमले के बाद वह भी युद्ध के मैदान में कूद पड़ा।
जापान को सबक सिखाने के लिए उसने जो किया वह पर्ल हार्बर में किए जापान के गुनाह से बड़ा गुनाह साबित हुआ। जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराए गए अमेरिका के परमाणु बमों ने पूरी मानवता को शर्मसार कर दिया। हजारों लोग मारे गए और लाखों लोग हमेशा के लिए बीमार और अपाहिज हो गए। यहां तक कि आने वाली पीढ़ियां भी एटमी हथियारों के असर से अप्रभावित नहीं रह सकीं। ओबामा के साथ शिंजो आबे के पर्ल हार्बर जाने का मकसद कोई साढ़े सात दशक पहले के उस दुखद वाकये पर अफसोस जताना था। इससे पहले, ओबामा इसी साल मई में हिरोशिमा गए थे और वहां के शांति स्मारक पर फूल चढ़ा कर युद्ध में मारे लोगों के प्रति शोक प्रकट किया था। यह अमेरिका की उस समय की कार्रवाई पर खेद जताना भी था। हालांकि जापान और अमेरिका के रिश्ते दशकों से हमेशा दोस्ताना बने रहे हैं।
मगर एक तरफ पर्ल हार्बर और दूसरी तरफ हिरोशिमा व नागासाकी के जख्म भी उनकी यादों में रिसते रहे हैं। जापान के रूढ़िचुस्त राष्ट्रवादी सोचते थे कि पर्ल हार्बर पर अफसोस जताने का मतलब होगा, अपनी कारगुजारी को मान लेना। इसी तरह अमेरिका के पूर्व सैन्य अफसरों की दलील होती थी कि हिरोशिमा और नागासाकी में जो हुआ वह जरूरी था, क्योंकि इससे युद्ध का अंत जल्दी आ गया, इसलिए उस पर खेद जताने की जरूरत नहीं है।
लेकिन राष्ट्रपति ओबामा ने, जिन्हें शांति की ‘संभावनाओं के लिए’ नोबेल पुरस्कार दिया गया था, इराक व अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी तो की ही, अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों में उन्होंने दूसरे विश्वयुद्ध के भी दो बड़े जख्मों को भरने की पहल की। लेकिन यह दुखद है कि उनके उत्तराधिकारी डोनाल्ड ट्रम्प इससे उलट राग अलाप रहे हैं। पिछले दिनों ट्वीट करके उन्होंने कहा कि ‘जब तक परमाणु हथियारों के मामले में दुनिया को सद््बुद्धि नहीं आती तब तक अमेरिका को अपनी एटमी क्षमताओं को और मजबूती तथा विस्तार देना चाहिए।’ स्वाभाविक ही उनके इस बयान ने सारी दुनिया में चिंता पैदा की है। अगर ट्रम्प का यही रवैया रहा, तो यह खुद अमेरिका के लिए भी नुकसानदेह साबित होगा, क्योंकि तब वे विश्व जनमत के बीच अमेरिका-विरोध का ही भाव पैदा करेंगे।

