लंदन के वेस्टमिन्सटर यानी लंदन ब्रिज और बरो मार्केट में हुए आतंकी हमले ने एक बार फिर लंदन की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। यह अंतरराष्टÑीय स्तर पर आतंकवाद से निपटने की तैयारियों की भी चुनौती है। पिछले तीन महीनों में लंदन में यह तीसरा बड़ा आतंकी हमला है। इसमें सात लोगों के मारे जाने और अड़तालीस के गंभीर रूप से घायल होने की खबर है। शनिवार रात को एक कार चालक ने लंदन ब्रिज पर पैदल चल रहे लोगों को कुचलने की नीयत से फुटपाथ पर गाड़ी चढ़ा दी। फिर अफरा-तफरी मची तो गाड़ी से उतर कर हमलावरों ने लोगों पर चाकू से हमले शुरू कर दिए। पुल से सटे बरो बाजार के खानपान वाले इलाके में भी लोगों पर चाकू से हमला किया गया। सप्ताहांत में इस इलाके में खासी भीड़भाड़ होती है। जाहिर है, हमलावरों ने सोची-समझी रणनीति के तहत इस वारदात को अंजाम दिया। हालांकि लंदन पुलिस ने तीन हमलावरों को मार गिराया है, मगर इस तरह किए गए हमले ने सुरक्षा-व्यवस्था की चुनौतियों को उजागर किया है।
मार्च में भी एक ब्रितानी नागरिक ने इसी तरह पैलेस आॅफ वेस्टमिन्सटर के पास पैदल चल रहे लोगों पर कार चढ़ा दी थी, जिसमें चार लोग मारे गए थे। फिर कार चालक ने एक सुरक्षाकर्मी की चाकू मार कर हत्या कर दी थी। जाहिर है, अब आतंकी हमले के नए तरीके अपना रहे हैं। आतंकी हमलों का मकसद सिर्फ लोगों को जान से मारना नहीं होता। लोगों में दहशत पैदा करना और सुरक्षा-व्यवस्था को चुनौती देना भी होता है। इसलिए अब दहशतगर्द लंबी रणनीति बनाने के बजाय ऐसे तरीके अपना रहे हैं, जिसके लिए न तो हथियारों के जखीरे की जरूरत होती है और न संचार माध्यमों के जरिए लंबे समय तक अपने गिरोह के लोगों से संपर्क में रहने की जरूरत होती है। संचार माध्यमों के जरिए अधिक लोगों के साथ संपर्क में रहने का जोखिम यह होता है कि सुरक्षाबलों को उनकी योजनाओं का पता चल जाता है। इसलिए अब वे लोगों पर कार चढ़ा कर या फिर तेज धार वाले हथियारों से हमले कर अपने मकसद में कामयाब हो रहे हैं। ये भी एक तरह के आत्मघाती हमलावर हैं।
अब सवाल उठ रहे हैं कि आतंकी लंदन को बारबार निशाना क्यों बना रहे हैं। क्या वहां की सुरक्षा-व्यवस्था को और चाक-चौबंद बनाने की जरूरत है। हालांकि ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने एक बार फिर इस चुनौती का सामना करने का दम भरा है और अमेरिकी राष्टÑपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी दोहराया है कि वे जहां तक हो सकता है, इस चुनौती से पार पाने में मदद को तैयार हैं। मगर हकीकत यह है कि आइएस जैसे संगठन रोज नए उपाय तलाश कर उनके लिए मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं। वे पश्चिमी देशों को इसलिए भी निशाना बनाते हैं ताकि पूरी दुनिया को संदेश दे सकें कि वे अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस जैसे देशों के आतंकवाद को समाप्त करने के इरादे से भयभीत नहीं हैं। जिस तरह अमेरिका ने इस्लाम को निशाने पर ले रखा है और ब्रिटेन उसके इस अभियान में साथ खड़ा है, उसमें स्वाभाविक रूप से ये देश आइएस का निशाना बन रहे हैं। आइएस ने इन देशों में बड़ी तादाद में अपने कार्यकर्ता तैयार कर लिए हैं। लंदन की घटनाओं में हमलावर बाहर के नहीं, वहीं के नागरिक थे। इसलिए अब आतंकवाद से लड़ने के उपायों पर इन देशों को नए सिरे से विचार करने की जरूरत है।

