लंदन में पिछले हफ्ते पार्लियामेंट स्ट्रीट पर भारत के राष्ट्रध्वज को जलाए जाने की घटना पर भारत सरकार की नाराजगी स्वाभाविक है। इस घटना को भारतीय विदेश मंत्रालय ने उचित ही काफी गंभीरता से लिया और ब्रिटेन से तिरंगा जलाने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की। इसका अपेक्षित असर भी हुआ। एक तो यह कि इस घटना के लिए ब्रिटेन के विदेश विभाग ने भारत सरकार से माफी मांगी। दूसरे, ब्रिटेन की सरकार ने इस मामले की जांच के लिए लंदन मेट्रोपोलिटन पुलिस की एक विशेष टीम गठित कर दी। गौरतलब है कि लंदन में राष्ट्रमंडल देशों के शासन प्रमुखों की बैठक में हिस्सा लेने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वहां गए थे। मेहमान शासन प्रमुखों के सम्मान में उन तिरपन देशों के झंडे एक कतार में लगे हुए थे। लंदन की अपनी इस यात्रा में मोदी ने राष्ट्रमंडल की बैठक में शिरकत करने के अलावा ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया और बांग्लादेश के प्रधानमंत्रियों के साथ द्विपक्षीय वार्ताएं भी कीं। लेकिन तिरंगे के अपमान की घटना की तीखी प्रतिक्रिया लंदन प्रवास के उनके कार्यक्रम में भी दिखी। अपनेलंदन प्रवास की अवधि में उन्होंने छह घंटे की कटौती कर दी और वे निर्धारित समय से पहले ही जर्मनी के लिए रवाना हो गए। क्या पता वे निर्धारित समय तक वहां रहते, तो कुछ और देशों के शासन प्रमुखों के साथ उनकी द्विपक्षीय वार्ताएं हुई होतीं।
लंदन से रवाना होने से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने तकनीकी सहयोग के लिए बनाए गए राष्ट्रमंडल कोष में भारत के योगदान को दोगुना करने की घोषणा की। बहरहाल, जिस तरह उनके प्रशंसक और समर्थक उनका इंतजार कर रहे थे, उसी तरह कुछ विरोधी भी। ब्रिटेन सरकार ने कहा है कि शांतिपूर्ण ढंग से विरोध जताना हर किसी का अधिकार है। एक लोकतांत्रिक देश होने के नाते ब्रिटिश सरकार की इस बात को खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन विरोध दशाने का अर्थ किसी देश का ध्वज जलाना या फाड़ना नहीं हो सकता। प्रदर्शनकारी अपने हाथों में तख्तियां लिये हुए थे। वे जो कुछ कहना चाहते थे वह उनकी तख्तियों और उनके नारों से जाहिर हो जा रहा था। फिर वे एक देश के मान-सम्मान और गौरव के प्रतीक यानी राष्ट्रीय ध्वज को सरेआम अपमानित करने की हद तक क्यों चले गए? शायद इसका कारण यही होगा कि प्रदर्शनकारियों में सिख अलगाववादी भी थे और कश्मीरी अलगाववादी भी, और उन्होंने खालिस्तान तथा आजाद कश्मीर के पक्ष में नारे भी लगाए।
ऐसे ही तत्त्वों ने गणतंत्र दिवस पर लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग के सामने प्रदर्शन किया था। अगर ऐसे लोग भारत के राष्ट्रध्वज के प्रति सम्मान की भावना नहीं रखते, तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। लेकिन सवाल है कि लंदन पुलिस, जो कि वहां भारी संख्या में मौजूद थी, भारत के राष्ट्रध्वज को जलाए जाते और फाड़े जाते चुपचाप क्यों देखती रही? क्या उसे प्रदर्शनकारियों को यह कृत्य करने से रोकना नहीं चाहिए था? अब ब्रिटेन सरकार और उसके निर्देश पर लंदन पुलिस हरकत में आई है, तो यह भारत की तीखी प्रतिक्रिया का ही असर है। ब्रेक्जिट से बाहर होने के फैसले के बाद ब्रिटेन की निगाह में निवेश और व्यापार के लिए भारत की अहमियत बढ़ गई है। यह भी एक कारण है कि भारत की नाराजगी की अनदेखी वहां की सरकार नहीं कर सकती।
