विधायिका में आपराधिक छवि के लोगों की पहुंच रोकने के तमाम प्रयासों के बावजूद इस दिशा में कामयाबी नहीं मिल पा रही है। इसकी बड़ी वजह है कि खुद राजनीतिक दल ऐसे लोगों से दूरी बना कर नहीं रख पाते। इस बार पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों में सबसे अधिक दागी उम्मीदवार उत्तर प्रदेश में उतारे गए हैं। इस मामले में कोई राजनीतिक दल ऐसा नहीं है, जिसने टिकट बांटने में धनबल और बाहुबल वाले लोगों से दूरी बना कर रखी है। हर चुनाव में ऐसा देखा जाता है, बल्कि अब राजनीतिक दल ऐसे लोगों को टिकट देना ज्यादा मुनासिब समझते हैं, जिनका समाज में दबदबा हो, जो धन या बाहुबल के जरिए चुनाव जीतने की कूवत रखते हों। पार्टियों की इस प्रवृत्ति पर नकेल कसने के मकसद से नियम बना कि जिन लोगों को आपराधिक मामले में दोषी करार दे दिया गया हो, उन्हें चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं होगा। मगर अधिकतर लोग इस आधार पर चुनाव लड़ते हैं कि उनका दोष सिद्ध नहीं हुआ होता। दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग भी ऐसे लोगों को चुनाव लड़ने से नहीं रोक पाता।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि बहुत सारे नेताओं पर राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा के चलते सत्ता पक्ष गलत इरादे से कुछ ऐसे मामले दर्ज करा देती है, जिसके लिए वे वास्तव में दोषी नहीं होते। कई बार आंदोलनों वगैरह में हिस्सा लेने की वजह से भी अनेक लोगों पर आपराधिक धाराओं के अंतर्गत मुकदमे दर्ज कर दिए जाते हैं। ऐसे लोग प्राय: अदालतों से दोष मुक्त हो जाते हैं या फिर खुद सरकारें उन पर से मुकदमा हटा लेती हैं। मगर ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जिन पर हत्या, बलात्कार, किसी जघन्य अपराध को बढ़ावा देने जैसे संज्ञेय मामले दर्ज होते हैं। कुछ लोगों को समाज में स्पष्ट रूप से अपराधी के रूप में पहचाना जा सकता है, पर पार्टियां कानून से गली निकाल कर उन्हें इस आधार पर टिकट दे देती हैं कि उनका दोष सिद्ध होना बाकी रहता है। इसके पीछे उनका मकसद सिर्फ यह होता है कि ऐसे लोग किसी न किसी तरह चुनाव जीतने में कामयाब हो सकते हैं।

यह प्रवृत्ति केवल चुनाव मैदान में उतरने या उतारने तक सीमित नहीं है। मंत्रिमंडल का गठन करते समय भी सत्ताधारी पार्टियां दागी नेताओं से दूरी बना कर रखना जरूरी नहीं समझतीं। कई दागी नेता मंत्री बना दिए जाते हैं। फिर ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब मंत्री बनने के बाद दागी नेताओं के खिलाफ चल रही जांच प्रभावित होती है। इस तरह अपराधमुक्त समाज का नारा देने वाली पार्टियां खुद अपराध को बढ़ावा देने वाली साबित होती हैं। उत्तर प्रदेश में पिछले पंद्रह सालों में जो भी पार्टी सत्ता में रही, उसके कार्यकाल में आपराधिक घटनाओं के बढ़ने के आंकड़े दर्ज हुए। समझना मुश्किल नहीं है कि जब पार्टियां खुद आपराधिक छवि के लोगों से निकटता बनाए रखेंगी, उन्हें पनाह देंगी, तो अपराध पर अंकुश लगाना उनके लिए कैसे संभव हो पाएगा। विचित्र यह भी है कि लंबे समय से दागी नेताओं को विधायिका से दूर रखने के लिए कड़े कानून बनाने की बात होती रही है, पर राजनीतिक दलों की इच्छाशक्ति के अभाव में कोई व्यावहारिक रास्ता नहीं निकल पाता। जब तक पार्टियां खुद आपराधिक छवि के लोगों से दूरी बनाने को प्रतिबद्ध नहीं होंगी, समाज में अपराध रोकने का उनका दावा कमजोर ही साबित होता रहेगा।