इराक में पौने चार साल पहले जिन चालीस भारतीय नागरिकों का अपहरण हुआ था, उसकी हकीकत अब सामने आई है कि उनमें से उनतालीस लोग मारे जा चुके हैं। तब एक व्यक्ति अपनी पहचान बदल कर बच निकला था। कट्टरपंथी संगठन आइएस यानी इस्लामिक स्टेट ने इन लोगों की हत्या कर एक गांव में दफना दिया था। सरकार इस खबर पर क्या रुख अपनाती है, यह आने वाले समय में पता चलेगा, लेकिन जिन घरों के नौजवान मारे गए, वे गहरे सदमे हैं। उन तमाम लोगों के परिवार वाले ज्यादा आहत इसलिए हैं कि सरकार ने शुरू में एक तरह से झूठ बोला और इस मसले पर देश को अंधेरे में रखा। अभी तक सरकार कहती आई थी कि इराक में लापता भारतीय सुरक्षित हैं। लेकिन अब डीएनए जांच से इन मौतों की पुष्टि हो जाने के बाद विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने मंगलवार को राज्यसभा में बयान देकर अगवा भारतीयों के मारे जाने के बारे में बताया। हालांकि लंबे समय से सरकार इस मुद्दे पर घिरी थी। मगर इतने संवेदनशील मामले में उसका अब तक का रवैया हैरान करने वाला है।
सवाल है कि जो तथ्य अब सामने आए हैं, क्या उनके बारे में सरकार को सचमुच पता नहीं था? अब जिस तरह यह मामला सामने आया और समय-समय पर इसकी परतें खुलती गर्इं, उससे स्पष्ट है कि अगवा भारतीयों की हत्या के संकेत सरकार को पहले ही मिल चुके थे। उनमें एक जो शख्स बच निकला था, उसने बताया था कि बाकी लोगों को आइएस ने मार डाला है। हालांकि विदेश मंत्री ने तर्क दिया है कि जब तक नागरिकों की मौत की पुष्टि नहीं हो जाती, तब तक उन्हें मृत घोषित नहीं किया जा सकता था। विदेश राज्यमंत्री वीके सिंह ने इराक जाकर वहां भारतीय राजदूत और इराकी अधिकारियों के साथ बैठकें कर खोजबीन का काम किया था। तब बदूश शहर के पास एक कब्र से जो उनतालीस शव और परिचय पत्र, कड़े, लंबे बाल आदि मिले, वे काफी कुछ बताने के लिए पर्याप्त थे। इसके बावजूद पिछले साल जब मारे गए लोगों के परिजन विदेश मंत्री से मिले, तब भी उन्हें यह भरोसा दिया गया था कि अगवा लोग सुरक्षित हैं। ये सारे तथ्य और घटनाएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि सरकार शायद सच्चाई को देश के सामने रखने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी।
अब विदेश मंत्री का यह कहना भारत सरकार की सीमा को बताता है कि ‘इराक में सबूत जुटाना बहुत ही मुश्किल था। एक निर्मम आतंकी संगठन आइएसआइएस और सामूहिक कब्रें..। शवों का ढेर था। इनमें से अपने लोगों के शवों का पता लगाना, उन्हें जांच के लिए बगदाद भेजना आसान नहीं था’। यह घटना कई गंभीर सवाल खड़े करती है। अगर एक बचा हुआ व्यक्ति सच नहीं बताता कि लोगों को आइएस ने मार डाला है तो सरकार के पास क्या कोई ऐसा तरीका था, जिससे इराक में वह अपने लोगों का पता लगा पाती? इसके अलावा, जब कोई देश खुद गंभीर संकटों से जूझ रहा हो और अपने ही नागरिकों की रक्षा नहीं कर पा रहा हो, तो ऐसे में अपने नागरिकों को वहां जाने से रोकने के हर इंतजाम किए जाने चाहिए। चोरी-छिपे दूसरे देशों में इस तरह जाना इतना आसान नहीं होता। फिर भी अगर लोग कोई गलत रास्ता अख्तियार करके दूसरे देशों में जाते हैं तो उन्हें रोकने के कड़े बंदोबस्त होने चाहिए। या फिर जिन एजेंसियों के जरिए लोग ऐसे देशों में रोजगार के लिए जा रहे हैं, उन पर निगरानी और शिकंजा कसा जाए।
