हवाई सफर के दौरान मोबाइल और इंटरनेट के इस्तेमाल पर पाबंदी अब बीते दिनों की बात हो जाएगी। जल्द ही भारत के वायु क्षेत्र में भी विमान में यात्रा करते हुए फोन और इंटरनेट इस्तेमाल करना संभव हो जाएगा। जल मार्ग से यात्रा करने वाले भी इस सुविधा का फायदा उठा सकेंगे। इस सेवा को शुरू करने के लिए दूरसंचार आयोग ने भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) की सिफारिश को हरी झंडी दे दी है। भारत की दूरसंचार सेवा में इसे एक बड़ा कदम माना जा रहा है। विमानों में यह सुविधा मुहैया कराने के लिए दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनियों को अलग से लाइसेंस लेने होंगे। शुरुआत में इन कंपनियों से औपचारिक लाइसेंस शुल्क एक रुपया सालाना लिया जाएगा, लेकिन इन्हें ग्राहकों से मनमाना पैसा वसूलने की छूट होगी। जाहिर है, ग्राहकों की जेब से पैसा निकाल कर कंपनियां अपना कारोबार खड़ा करेंगी। सेवा प्रदाता कंपनियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वसूले जाने वाले शुल्क को आधार बना कर यह शुल्क तय करेंगी। माना जा रहा है कि भारत में यह दो से तीन घंटे की हवाई यात्रा में दो सौ से तीन सौ रुपए तक हो सकता है। फिर भी यात्रियों के लिए यह एक बड़ी सुविधा होगी।

अमेरिका, यूरोपीय संघ के देशों और आस्ट्रेलिया सहित दुनिया के कई देशों में हवाई यात्रा के दौरान मोबाइल और इंटरनेट इस्तेमाल की सुविधा पहले से है। इन देशों में तीस से ज्यादा विमान कंपनियां यह सुविधा दे रही हैं। दूरसंचार सेवाओं के क्षेत्र में दुनिया के दूसरे देशों का मुकाबला करने के मकसद से ही इस साल जनवरी में ट्राई ने दूरसंचार आयोग से विमानों में फोन और इंटरनेट सेवा शुरू करने की सिफारिश की थी। हालांकि आयोग ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह सेवा उन्हीं भारतीय उपग्रहों के जरिए दी जाएगी, जिन्हें अंतरिक्ष विभाग से मंजूरी मिली हुई है। सुरक्षा और संवेदनशीलता की दृष्टि से इसकी कमान भारत में ही रहेगी। अगर विदेशी कंपनियों को भारतीय वायु क्षेत्र में इस सुविधा का इस्तेमाल करना है, तो उन्हें भारतीय दूरसंचार विभाग से अनुमति लेनी होगी।
पर सवाल है कि विदेशी विमान कंपनियों की तरह क्या भारतीय विमान कंपनियां इसके लिए तैयार हैं? विमान में फोन और इंटरनेट सुविधा मुहैया कराने की लागत ऐसा बड़ा पहलू है, जो इस सेवा को लेकर संशय पैदा करता है। घरेलू बाजार में दबदबा रखने वाली सस्ती विमान कंपनियों ने तो अभी से नाक-भौंह सिकोड़नी शुरू कर दी है। इन कंपनियों का मानना है कि कम दूरी और समय वाली उड़ानों में ऐसी सुविधाएं देना उनके लिए भारी पड़ेगा।

जाहिर है, इन कंपनियों को फिलहाल इसमें कोई मुनाफा नजर नहीं आ रहा। घरेलू उड़ान सेवाओं में छोटे विमानों का इस्तेमाल ज्यादा होता है और इनमें यात्रियों की संख्या अपेक्षाकृत कम रहती है। यात्रा का वक्त भी औसतन एक से डेढ़ घंटे का होता है। ऐसे में वाई-फाई सुविधा मुहैया कराने की जो लागत बैठती है वह ढाई घंटे की यात्रा में भी नहीं वसूली जा सकती। विमान में वाई-फाई सुविधा के लिए कुछ बदलाव करने पड़ते हैं और एंटीना भी लगाना पड़ता है। बैंडविड्थ शुल्क भी कंपनियों को भरना पड़ेगा। यानी जो लागत आएगी, वह यात्रियों की जेब से ही निकाली जाएगी। ऐसे में घरेलू उड़ानों में यह सुविधा देना एक चुनौती है। इसलिए विमानों में मोबाइल और इंटरनेट सेवा मुहैया कराने के लिए शुल्कोंको तर्कसंगत बनाना होगा।