यह शिकायत पुरानी है कि ज्यादातर जनप्रतिनिधि चुनाव जीतने के बाद अपने निर्वाचन क्षेत्र की सुध लेना भूल जाते हैं। अगर कुछ विकास कार्यक्रमों की तरफ ध्यान देते भी हैं तो उनका रवैया पक्षपातपूर्ण ही देखा जाता है। उन्हीं लोगों, संस्थाओं और गांवों आदि को सरकारी योजनाओं का लाभ अधिक मिल पाता है, जिनकी जनप्रतिनिधियों से नजदीकी होती है। इस शिकायत को दूर करने के लिए अक्सर पार्टी आलाकमान और सरकार के मुखिया सांसदों, विधायकों को नसीहत देते रहते हैं कि वे अपने निर्वाचन क्षेत्रों में जाकर लोगों से नजदीकी बनाएं, उनकी समस्याओं को जानें और दूर करें। पर जनप्रतिनिधियों में यह प्रवृत्ति घर-सी कर गई है कि वे देश या राज्यों की राजधानियों में सिमट कर रह जाते हैं, ज्यादा हुआ तो अपने जिला मुख्यालयों पर बैठ कर लोगों की समस्याएं सुन और उन्हें हल करने का आश्वासन देकर अपना कर्तव्य पूरा मान लेते हैं। प्रधानमंत्री ने संसद के केंद्रीय कक्ष में आयोजित जनप्रतिनिधियों के सम्मेलन में कहा कि अब पुराने ढंग की राजनीति प्रासंगिक नहीं रह गई है। अब उन्हीं प्रतिनिधियों को लोग पसंद करते हैं, जो अपने क्षेत्रों के विकास और सामाजिक न्याय के लिए काम करते हैं। इसलिए उन्हें अपनी जिम्मेदारी समझने की जरूरत है। देश का विकास भी तभी संभव है, जब जनप्रतिनिधि सामाजिक न्याय के लिए विकास कार्यों में हिस्सेदारी करेंगे।
प्रधानमंत्री पहले भी कुछ मौकों पर जनप्रतिनिधियों के कर्तव्यों को रेखांकित कर चुके हैं। उन्हें अपने निर्वाचन क्षेत्रों में जाकर विकास कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने की नसीहत दे चुके हैं। मगर उसका कोई उल्लेखनीय नतीजा सामने नहीं आ पाया है। इसलिए उनकी ताजा सलाह को वे कितनी गंभीरता से लेंगे, कहना मुश्किल है। इस बात से आंख नहीं चुराई जा सकती कि जब तक निर्वाचित प्रतिनिधि निष्पक्ष तरीके से अपने निर्वाचन क्षेत्रों के पिछड़े इलाकों की पहचान कर उनकी उन्नति के प्रयास नहीं करेंगे, तब तक न तो सही मायने में विकास संभव हो पाएगा और न सभी वर्गों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंच पाएगा। प्रधानमंत्री ने रेखांकित किया कि देश में करीब सवा सौ जिले अल्पविकसित हैं, उनमें विकास कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने की जरूरत है। वहां सभी घरों तक बिजली-पानी और सभी बच्चों तक स्कूल आदि की सुविधाएं पहुंचाना चुनौती है। गांवों और गरीबों, पिछड़ों, समाज के हाशिये पर रह गए लोगों के लिए अनेक सरकारी योजनाएं हैं, पर उनका समुचित लाभ नहीं मिल पा रहा तो, यह जनप्रतिनिधियों की ही कमी मानी जाएगी।
देश के हर हिस्से तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने के मकसद से ही विधायक और सांसद निधि का प्रावधान किया गया था। वर्तमान सरकार ने हर सांसद को कम से कम दो अति पिछड़े गांवों को गोद लेने का नियम बनाया, ताकि वे सांसद निधि से अपने निर्वाचन क्षेत्र के वंचित गांवों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराएं और उन्हें आदर्श गांव के रूप में विकसित करें। पर उस दिशा में भी अपेक्षित संजीदगी नहीं देखी गई है। वह रस्मी कवायद ही ज्यादा लगती है। कायदे से जन प्रतिनिधियों को राजधानी में उसी वक्त रहने की जरूरत होती है, जब संसद या विधानसभा के सत्र चल रहे हों। बाकी समय उनसे अपने निर्वाचन क्षेत्र में रहने की अपेक्षा की जाती है। इसके लिए उन्हें बकायदा भत्ते तय हैं। पर कम ही प्रतिनिधि इस अपेक्षा पर खरे उतरते हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री की नसीहत को प्रतिनिधि गंभीरता से लें, तो विकास की गति कुछ बढ़ने का भरोसा बनेगा।
