अगर सांसद क्षेत्रीय विकास निधि को खत्म करने का प्रस्ताव आए तो हमारे सांसदों की कैसी प्रतिक्रिया होगी इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। संभवत: वे नाराज हो जाएंगे और इस निधि के महत्त्व और उपयोगिता का बखान करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। इस राशि के आबंटन को लेकर उनकी ललक इससे भी जाहिर है कि उनकी मांग के दबाव में समय-समय पर यह राशि बढ़ाई जाती रही है। लेकिन क्षेत्रीय विकास निधि के इस्तेमाल की कसौटी पर वे कहां खड़े हैं? हमारे सांसदों को हर साल पांच करोड़ रुपए अपने निर्वाचन क्षेत्र में विकास-कार्यों के लिए आबंटित होते हैं। आधी राशि नई लोकसभा गठित होने के बाद जारी कर दी जाती है। कुछ खर्च करने के बाद सांसद बाकी राशि की मांग करते हैं।
खबर है कि नई लोकसभा के अधिकतर सदस्यों ने अपनी क्षेत्रीय विकास निधि का मामूली हिस्सा ही खर्च किया है। फरवरी में सभी सांसदों को कुल आबंटित राशि का दो फीसद से भी कम खर्च हुआ था। अब भी स्थिति में कोई खास फर्क नहीं आया है। ऐसे भी सदस्य हैं जिन्होंने अपनी निधि का कुछ भी इस्तेमाल नहीं किया। इनमें अनेक बड़े नाम हैं जिनमें अनेक मंत्री और विपक्ष के कई दिग्गज भी शामिल हैं। जब 1993-94 में प्रति सांसद पांच लाख रुपए सालाना के साथ यह योजना शुरू की गई थी तब नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे। उस समय लोकसभा में उनके बहुमत में थोड़ी कसर थी। इसलिए इस योजना को सांसदों को खुश करने की उनकी कवायद के रूप में देखा गया था। कुछ सवाल भी उठे थे।
सांसदों का काम विधायी कार्यों में हिस्सा लेना, सदन में राष्ट्रीय महत्त्व के और जन-सरोकार के मसले उठाना और सरकार की संसदीय जवाबदेही तय करना है। जब नीति-निर्माण में उनकी इतनी अहम भागीदारी है, तो अलग से विवेकाधीन राशि आबंटित करने की क्या जरूरत है? उन्हें वैसे कामों में क्यों पड़ना चाहिए, जो सरकारी महकमों और स्थानीय निकायों के लिए तय हैं। लेकिन इन सवालों को नजरअंदाज कर दिया गया। शायद इसलिए कि आबंटित राशि के जरिए निर्वाचन क्षेत्र में अपनी पकड़ और मजबूत करने का मौका सांसदों को दिख रहा था। फिर इसकी देखादेखी तमाम राज्यों में विधायक क्षेत्रीय विकास निधि भी शुरू हो गई। विधायकों की विकास निधि के खर्च का रिकार्ड बेहतर रहा है, पर उपयोग के तौर-तरीके की अन्य विसंगतियां वहां भी रही हैं। इस पैसे के इस्तेमाल को लेकर कुछ मानक तय हैं।
मसलन, वे किस मद में खर्च किए जा सकते हैं और किनमें नहीं। मगर जब-तब हुए अध्ययन निर्धारित मापदंडों की अनदेखी के बहुतेरे उदाहरण पेश करते हैं। कई ऐसे मदों में भी राशि लगा दी गई, जिसके लिए नियम इजाजत नहीं देते। नियंत्रक एवं महा लेखा परीक्षक ने भी ऐसी गड़बड़ियां उजागर की हैं। और अब तो राशि के इस्तेमाल न होने के मामले जिस तरह बढ़ते जा रहे हैं उससे इस योजना के औचित्य पर ही सवाल उठता है। क्षेत्रीय विकास निधि खर्च करने में फिसड््डी रहने वालों में ज्यादातर बड़े राजनीतिक हैं। शायद उनकी व्यस्तता इसकी प्रमुख वजह हो। फिर, औसत रिकार्ड भी अच्छा नहीं है। राशि का संतोषजनक इस्तेमाल करने वाले इने-गिने सांसद ही हैं। फिर, इस योजना को जारी रखने की जरूरत क्या है!
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