गुजरात के ऊना में चार दलित युवकों को बर्बरता से पीटने के मामले के तूल पकड़ने के बाद वहां उभरी तीखी प्रतिक्रिया से राज्य सरकार की नींद जरूर खुली दिखती है, लेकिन यह कहना मुश्किल है कि इस मसले पर वह कितनी गंभीर है। पिछले तीन-चार दिनों से हो रहे विरोध प्रदर्शनों ने उग्र शक्ल अख्तियार कर ली, सात दलितों ने आत्महत्या की कोशिश की, उनमें से एक की जान चली गई और दूसरी तरफ टकराव में घायल एक पुलिसकर्मी की मौत हो गई। अब संसद तक में इस समूचे मामले की जांच संसदीय समिति से कराने की मांग हो रही है, तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? गौरतलब है कि बारह जुलाई को महज एक मृत गाय की खाल उतारने पर चार दलित युवकों को सार्वजनिक रूप से अर्धनग्न कर एक कार में बांध कर लोहे के डंडे से लगातार पीटा गया, शहर भर में घुमाया गया और उसका वीडियो बना कर फैलाया गया। हिंदू शिवसेना से जुड़े गोरक्षा दल की इस आपराधिक करतूत के सरेआम और रिकॉर्ड पर होने के बाद भी सरकार और प्रशासन को उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करना जरूरी नहीं लगा। लेकिन हैरानी की बात है कि गुजरात सरकार की जिस लापरवाही के लिए उसे कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए था, संसद में गृहमंत्री राजनाथ सिंह उसे कार्रवाई करने के लिए बधाई दे रहे थे।

पिछले डेढ़-दो सालों में गोरक्षकों की ऐसी हिंसा के कई मामले सामने आए हैं। ऊना की घटना ने समूचे दलित समुदाय में क्षोभ पैदा कर दिया कि क्या अब उनकी जीविका का आधार रहा पारंपरिक पेशा ही उन्हें प्रताड़ित किए जाने का कारण बनेगा! जाहिर है, सामाजिक जीवन का यह एक ऐसा बिंदु है, जहां कोई भी व्यक्ति या समुदाय हताश हो सकता है! शायद यही वजह है कि गुजरात के कई जिलों में फैल गए विरोध प्रदर्शन में दलितों ने अपना दुख जाहिर करने के लिए एक नए, लेकिन लोगों को असहज कर देने वाले तरीके का इस्तेमाल किया और समाज से लेकर सत्ता तक को दलितों की सामाजिक स्थिति से उपजी पीड़ा के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने वाहनों में भर कर मरी हुई गाएं और उनके अवशेष कलक्टर के आॅफिस और कुछ दूसरे सरकारी दफ्तरों में ले जाकर फेंक दिए।

संदेश यही था कि जब मजबूरी के पारंपरिक पेशे में भी दलितों पर अत्याचार ढाए जा रहे हैं, तो अब मृत जानवरों के निपटान का काम सरकार ही करे। मगर इसने न सिर्फ मौजूदा घटना और उसके सामाजिक संदर्भों की ओर लोगों का ध्यान खींचा, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों में गाय के नाम पर उन्माद पैदा करने वाली हिंदुत्ववादी राजनीति को भी कठघरे में खड़ा किया। यह राजनीति एक ऐसा माहौल रचती है, जिसमें कभी उत्तर प्रदेश के दादरी में एक भीड़ कथित तौर पर गोमांस रखने पर मोहम्मद अखलाक की पीट-पीट कर हत्या कर देती है, तो कभी हरियाणा के दुलीना में मरी हुई गाय की खाल उतारते पांच दलितों की र्इंट-पत्थरों से मार-मार कर जान ले लेती है। सवाल है कि अगर देश में संविधान और कानून-व्यवस्था का राज है तो गोरक्षा के नाम पर किसी को बर्बरता से पीटने या जान लेने की छूट कौन देता है? कौन ऐसा माहौल रचता है, जिसमें कुछ बेरोजगार और दिग्भ्रमित युवक इंसानी मूल्यों को बचाने के बजाय गाय के नाम पर हिंसा करने से बाज नहीं आते?