अनेक अध्ययनों से जाहिर हो चुका है कि डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ बच्चों की सेहत पर बुरा असर डालते हैं। इस मसले पर जताई जा रही चिंताओं के मद्देनजर बच्चों को इन खाद्य पदार्थों से दूर रखने की कुछ कोशिशें भी हुई हैं। मसलन, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी सीबीएसइ ने डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश तय किए हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस संबंध में सख्त निर्देश जारी किए थे। लेकिन संबंधित महकमों की ओर से इस दिशा में आधे-अधूरे मन से की गई कोशिशों का कोई ठोस नतीजा अब तक सामने नहीं आ सका है। अब इस समस्या की गंभीरता के मद्देनजर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने स्कूलों की कैंटीनों में ऐसे खाद्य पदार्थों की उपलब्धता पर पूरी तरह पाबंदी लगाने के मकसद से सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के शिक्षा बोर्डों और राज्य बाल आयोगों को कहा है कि वे सीबीएसइ की तरह स्पष्ट दिशा-निर्देश तय करें। बेशक यह पहल उन बच्चों की सेहत के प्रति आयोग की चिंता को दर्शाती है, जो स्कूलों की कैंटीनों में उपलब्धता के चलते आसानी से डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों की जद में आ जाते हैं। लेकिन सवाल है कि खाने-पीने की जिन चीजों के बारे में पिछले कई सालों के दौरान हुए अध्ययनों के निष्कर्ष साफ हैं कि ये बच्चों की सेहत पर चुपचाप घातक असर डालती हैं, मोटापा, हड्डियां कमजोर होने, मधुमेह, पथरी, उच्च रक्तचाप, हृदयरोग जैसी बीमारियां घेर लेती हैं, उस पर आज भी सरकार को कोई सुचिंतित पहल करना जरूरी क्यों नहीं लगता! ऐसा लगता है कि न सिर्फ कुछ संगठनों की चिंताओं, बल्कि इस संबंध में अदालती निर्देशों के बावजूद अब भी छोटे बच्चों को इन खाद्य पदार्थों के खतरे से जूझने के लिए छोड़ दिया गया है।
एक बड़ी विडंबना यह भी है कि जिन स्कूलों में बच्चों को स्वस्थ रहने के लिए अच्छे और पौष्टिक भोजन के बारे में बताया जाता है, वहीं की कैंटीन में या स्कूल के आसपास ऐसे खाद्य पदार्थ खुलेआम बिकते पाए जाते हैं। सच यह भी है कि बच्चे सिर्फ स्कूल कैंटीन में उपलब्धता की वजह से इस तरह की खाने-पीने की चीजों को लेकर आकर्षित नहीं होते, बल्कि उनके घरों के आसपास और खरीदारी की जगहों पर आसानी से मिलने वाले डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ उन्हें इस आदत से बचने नहीं देते। फिर टीवी या दूसरे माध्यमों के जरिए लगभग हर वक्त चल रहे विज्ञापन भी बच्चों सहित उनके अभिभावकों को डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों के जाल में बांधे रखते हैं। बल्कि कई विज्ञापन इस तरह परोसे जाते हैं कि उन्हें खाना आधुनिक जीवनशैली को अपनाना और बाकी लोगों के मुकाबले खुद को श्रेष्ठ बनाना है। फिर कई लोग व्यस्तता या वक्त बचाने के नाम पर, या फिर दिखावे के लिए घर में बने भोजन के बजाय डिब्बाबंद खाद्य को वक्त की जरूरत बताते हैं। यह बेवजह नहीं है कि स्कूली बच्चे धीरे-धीरे अनाज या दूसरे खाद्यान्न की जगह पौष्टिकता से दूर इन ब्रांडेड कहे जाने वाले खाद्य पदार्थों की ओर सहजता से आकर्षित होते हैं और कई बार जरूरत न होने पर भी इनका सेवन करते हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारें राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के निर्देश पर गंभीरता दिखाएंगी और भावी पीढ़ी की सेहत के सवाल की अब और अनदेखी नहीं होने देंगी।
