यह अच्छी बात है कि अब तक के अनुभवों से सबक लेते हुए सरकार ने अगले ओलंपिकों के मद्देनजर दीर्घकालीन तैयारी की पहल की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को मंत्रिपरिषद की बैठक में एलान किया कि 2020, 2024 और 2028 में होने वाले ओलंपिक मुकाबलों में भारतीय खिलाड़ियों का प्रभावी प्रदर्शन सुनिश्चित करने के मकसद से विस्तृत कार्ययोजना बनाने के लिए कार्यबल का गठन किया जाएगा। इस फैसले का औचित्य जाहिर है। ओलंपिक मुकाबलों में भारत का रिकार्ड बहुत ही शोचनीय रहा है। चौबीस ओलंपिकों में भाग लेकर उसने केवल अट्ठाईस पदक हासिल किए हैं। इस लिहाज से रियो ओलंपिक में भारत का प्रदर्शन खराब नहीं कहा जाएगा। पर अपने पिछले रिकार्ड के बजाय, दुनिया की तस्वीर सामने रखें, तो भारत का प्रदर्शन बहुत ही शोचनीय माना जाएगा। रियो में सिर्फ दो पदक हासिल हुए, एक रजत और एक कांस्य। एक भी स्वर्ण नहीं। पीवी सिंधु रजत और साक्षी मलिक कांस्य हासिल करने के लिए खूब प्रशंसा की पात्र हैं। पर उनके बजाय देश के लिहाज से देखें, तो ओलंपिक के नक्शे में भारत कहां खड़ा है? पदक तालिका में वह सड़सठवें स्थान पर है। जबकि आबादी और क्षेत्रफल में उससे कई बहुत छोटे-छोटे देशों ने कई-कई पदक हासिल किए हैं।
अगर अर्थव्यवस्था के आकार और आबादी के पहलू को शामिल कर हिसाब लगाएं तो भारत वास्तव में सत्तासीवें नंबर पर है। भारत को 2012 के लंदन ओलंपिक में छह पदक मिले थे, पर उसने 1980 के बाद पहला स्वर्ण पदक 2008 में जाकर जीता, जो बीजिंग ओलंपिक में निशानेबाजी के मुकाबले में अभिनव बिंद्रा को मिला था। रियो ओलंपिक से पहले देश के खेल अफसरों ने खूब बढ़-चढ़ कर दावे किए थे। इस बार एक सौ अठारह खिलाड़ियों का अब तक अपना सबसे बड़ा दल भी भारत ने भेजा था। मगर सारे दावे धरे के धरे रह गए।
दो महिला खिलाड़ियों ने किसी तरह लाज रख ली। उनकी कामयाबी सराहनीय है, पर देश के हिसाब से भारत ओलंपिक में फिसड््डी ही कहा जाएगा। यह हालत तब है जब हमारे नीति नियंता भारत के एक तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था होने का दम भरते और जल्दी ही एक आर्थिक महाशक्ति बन जाने का सपना दिखाते नहीं थकते। सवाल है कि शेखियों के बरक्स ओलंपिक में भारत की ऐसी हालत क्यों है? इसकी एक नहीं, कई वजहें रही हैं।
भारत क्रिकेट केंद्रित है। दूसरे खेलों और उनके खिलाड़ियों को महत्त्व नहीं दिया जाता। कोई पदक पाकर लौटता है तो उसके स्वागत में पलक पांवड़े बिछ जाते हैं, मगर फिर देश जल्दी ही क्रिकेट में सिमट जाता है। खेल का बजट तो अपर्याप्त है ही, खेल प्रतिभाओं के चयन में निष्पक्षता की कमी की शिकायतें मिलती रहती हैं। फिर, रही-सही कसर संसाधनों तथा प्रशिक्षण के अभाव से पूरी हो जाती है। देश में खेलतंत्र कैसा है इसका अंदाजा इसी से हो जाता है कि तमाम खेल संघों के अहम पदों पर राजनीतिक काबिज हैं। या तो उनकी चलती है या फिर नौकरशाहों की। खेल विशेषज्ञों और अनुभवी खिलाड़ियों की राय को सबसे ज्यादा अहमियत मिलनी चाहिए, पर उनकी बात सबसे कम सुनी जाती है। इस सारे गड़बड़झाले का खमियाजा हम ओलंपिक-दर-ओलंपिक भुगतते आ रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रस्तावित कार्यबल देश के खेलतंत्र को सुधारने की कारगर पहल साबित होगा और अगले ओलंपिक में इसका कुछ अपेक्षित परिणाम नजर आएगा।

