चेन्नई के एन्नोर बंदरगाह पर दो जलपोतों के टकराने से भारी मात्रा में फैले तेल की वजह से समुद्री जीवों पर संकट गहरा गया है। पिछले महीने की अट्ठाईस तारीख को दो पोत आपस में टकरा गए। एक जलपोत में पेट्रोलियम तेल भरा था और दूसरा एलपीजी गैस उतार कर वापसी के रास्ते में था। समुद्र में तेल फैलने की वजह से न सिर्फ सैलानियों, बल्कि समुद्री जीवों को मुसीबत का सामना करना पड़ रहा है। मगर विचित्र है कि केंद्र सरकार ने करीब एक हफ्ते बाद एन्नोर बंदरगाह की सफाई और जलपोतों के आपस में टकराने की जांच का आदेश दिया। अब कहा जा रहा है कि समुद्र में फैले तेल का साठ फीसद से अधिक हिस्सा साफ कर दिया गया है और जल-जीवों को इससे कोई खतरा नहीं है। मगर वहां तेल सनी गाद निकालने में जिस तरह की मुश्किलें पेश आ रही हैं, उसे देखते हुए कहना मुश्किल है कि जल्दी ही इस समस्या से पार पा लिया जाएगा।
बंदरगाहों पर सामान भरने और उतारने के लिए जलपोतों का आना-जाना लगा रहता है। पर उनका संचालन कंप्यूटरीकृत प्रणाली से होता है, इसलिए यह समझना मुश्किल है कि कहां लापरवाही हुई, जिसके चलते दोनों पोत आपस में इस कदर टकरा गए कि इतनी भारी मात्रा में तेल का रिसाव हो गया। खासकर ज्वलनशील पदार्थ ढोने वाले वाहनों के संचालन में विशेष सावधानी बरती जाती है, मगर इन पोतों के संचालन में यह ध्यान क्यों नहीं रखा गया। गनीमत है कि इस हादसे में कोई हताहत नहीं हुआ और न आग लगने जैसी कोई बड़ी घटना हुई। अब केंद्र और राज्य सरकारें यह भरोसा दिलाने में जुटी हैं कि इस घटना से जल-जीवों को कोई खतरा पैदा नहीं हुआ है। जबकि यह हकीकत किसी से छिपी नहीं है कि जब भी इस तरह की कोई घटना हुई है, भारी मात्रा में मछलियां और कछुए वगैरह मृत पाए गए हैं।
समुद्र में बढ़ते प्रदूषण और जलपोतों का आवागमन तेज होने से समुद्री जीवों के जीवन पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव को लेकर अनेक अध्ययन आ चुके हैं। समुद्र तटों पर सैलानियों द्वारा फैलाए गए कचरे और अन्य रासायनिक अपशिष्ट की वजह से अक्सर समुद्री जीवों के मरने की खबरें आती रहती हैं। वैसे ही समुद्री प्रदूषण की वजह से कछुओं और मछलियों आदि की अनेक प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर हैं। उनके संरक्षण के ठोस उपाय किए जाने की मांग उठती रही है। ऐसे में समुद्र में तेल फैलने से प्रदूषण का स्तर क्या हो गया होगा, अंदाजा लगाया जा सकता है। हालांकि बंदरगाह के कर्मचारी समुद्र में फैले तैलीय कचरे को हटाने में जुटे हुए हैं, पर उनके पास न तो उपयुक्त मशीनें हैं और न ऐसी स्थिति से निपटने का कोई पुख्ता प्रशिक्षण। अब भी बहुत सारे मजदूर बाल्टियों से गाद उलीचने में जुटे हुए हैं। जो मशीनें लगाई भी गई हैं, वे पर्याप्त नहीं हैं। एन्नोर जैसे व्यस्त बंदरगाहों पर, जहां रोज बड़ी संख्या में जलपोतों का आना-जाना लगा रहता है, वहां ऐसी स्थिति से तत्काल निपटने के कारगर इंतजाम क्यों नहीं किए जाते? बंदरगाह उद्योग आज दुनिया के कमाई वाले बड़े कारोबार में शामिल है, पर सुरक्षा इंतजाम के मामले में इस कदर लापरवाही होगी, तो इसका बुरा असर पड़ सकता है। सुरक्षा संबंधी पहलू के साथ-साथ समुद्री जीवन पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए।
