पंजाब के तकनीकी शिक्षा विभाग के मंत्री का सिक्का उछाल कर शिक्षक की तैनाती का फैसला विवाद की शक्ल लेने लगा है। स्वाभाविक रूप से इससे मंत्री के कामकाज के तौर-तरीके पर भी सवाल उठने लगे हैं। दरअसल, हुआ यों था कि दो पॉलीटेक्नीक कॉलेजों के अध्यापकों ने पटियाला के आइटीआइ बरेटा में तैनाती का आवेदन दिया था। मामला संबंधित महकमे के मंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के पास पहुंचा। उन्होंने मीडिया के सामने सिक्का उछाल कर फैसला किया कि किस अध्यापक को वहां तैनात किया जाएगा। इससे दोनों अध्यापक संतुष्ट भी हो गए। इस फैसले के पीछे चन्नी का तर्क है कि ऐसी तैनातियों के लिए पैसे-रुपए, सिफारिशों का चलन रहा है, पर उन्होंने इसकी परवाह किए बगैर मीडिया के सामने सिक्का उछाल कर पारदर्शी ढंग से दोनों अध्यापकों की किस्मत का फैसला करना उचित समझा। चन्नी ने तैनाती का यह तरीका निकाल कर खुद पर भ्रष्टाचार के आरोप से बचने में तो कामयाबी हासिल कर ली, पर सवाल है कि क्या इसे उचित प्रशासनिक तरीका कहा जा सकता है।
छिपी बात नहीं है कि लाभ वाले पदों और सुविधाजनक जगहों पर तैनाती पाने के लिए बहुत-से लोग रसूखदार लोगों तक पहुंच बनाने, उनकी सिफारिश लगवाने, पैसे तक खर्च करने से परहेज नहीं करते। राजनीतिक लोगों पर तैनातियों के जरिए पैसे कमाने के आरोप भी आम हैं। ऐसे में चन्नी ने अगर सिक्का उछाल कर पारदर्शी तरीके से तैनाती का कदम उठाया तो इसे भ्रष्टाचार से बचने का आसान उपाय कहा जा सकता है। आजकल जब बहुत सारे प्रतिष्ठित स्कूलों में दाखिले के लिए डोनेशन और सिफारिशें की जाती हैं, कुछ स्कूल लॉटरी प्रणाली के जरिए दाखिले की प्रक्रिया पूरी करते हैं। इस तरह सिक्का उछाल कर तैनाती करने का फैसला प्रथम दृष्टया अनुचित नहीं कहा जा सकता। अगर दोनों में से किसी एक के पक्ष में चन्नी का फैसला आता तो दूसरा पक्ष दबी जुबान से ही सही, सिफारिश और पैसे का आरोप लगाने से बाज नहीं आता। पर एक अच्छे प्रशासक के लिए ऐसे फैसले करना हमेशा उचित नहीं कहा जा सकता।
नियुक्तियों, तैनातियों, स्थानातंरण आदि के मामले में अभ्यर्थियों की योग्यता, कार्यकुशलता, वरिष्ठता आदि के आधार पर फैसले किए जाने का नियम है।
चन्नी के सामने केवल दो अभ्यर्थी थे, इसलिए उनकी किस्मत का फैसला उन्होंने सिक्का उछाल कर कर दिया। दो से अधिक होते तो शायद वे लॉटरी प्रणाली का सहारा लेते और अपने को बेदाग साबित करने का प्रयास करते। पर इस तरीके में संभव है कि योग्य को कम योग्य पछाड़ दे। इसलिए कायदे से अभ्यर्थियों की योग्यता परखी जानी चाहिए थी, फिर स्पष्ट आदेश जारी होना चाहिए था। आने वाले समय में अगर सिक्का उछाल कर या लॉटरी प्रणाली से तैनाती और स्थानांतरण की परिपाटी कायम करने की मांग उठने लगे, तो प्रशासनिक कामकाज में कई तरह की दिक्कतें पेश आएंगी। इस तरह के फैसलों से यह भी जाहिर होता है कि सरकार के पास नियुक्तियों, तैनातियों आदि को लेकर कोई स्पष्ट नीति नहीं है। सिक्का उछाल कर या लाटरी प्रणाली अपना कर कोई नीतिगत फैसला नहीं हो सकता। इसलिए पंजाब सरकार को ऐसे मामले में स्पष्ट नीति बनानी चाहिए। तैनातियों में जिन बिंदुओं का पालन होना चाहिए, वे अभ्यर्थियों के सामने स्पष्ट होने चाहिए। फिर पारदर्शिता सिर्फ सिक्का उछालने से नहीं आ जाती। अगर तर्क के साथ फैसला किया जाए और सिरे से तटस्थता बरती जाए, तो वह ज्यादा भरोसेमंद कदम साबित होगा।
