सीरिया के खिलाफ अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस की सम्मिलित सैन्य कार्रवाई हमारी वैश्विक संस्थाओं की नाकामी को ही रेखांकित करती है। विश्व शांति की चिंता करने और दुनिया को महाविनाशकारी हथियारों से बचाने का जिम्मा संयुक्त राष्ट्र का है। लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का हाल यह है कि वह दुनिया की बड़ी ताकतों के बीच बंटी हुई है या उनका अखाड़ा बनी हुई है। सीरिया के मामले में एक तरफ रूस है, और दूसरी तरफ अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस। चूंकि रूस के पास भी वीटो की ताकत है, इसलिए सुरक्षा परिषद में सीरिया के खिलाफ कोई प्रस्ताव उसकी मर्जी के बगैर पारित नहीं हो सकता। और सीरिया को रूस संकट में क्यों डालेगा, वह तो उसका खैरख्वाह बना हुआ है। बहरहाल, अमेरिका ने ब्रिटेन और फ्रांस के साथ मिल कर सीरिया पर मिसाइलें इसलिए दागीं, क्योंकि उनका कहना है कि सीरिया ने रासायनिक हथियारों का जखीरा जमा कर रखा था और कुछ दिन पहले उसने अपने विद्रोहियों के गढ़ वाले एक इलाके में इसका इस्तेमाल भी किया था, जिसके फलस्वरूप कोई सत्तर लोग मारे गए। दूसरी ओर, सीरिया और रूस इस आरोप को मनगढ़ंत बताते रहे हैं। सच्चाई जो हो, सवाल है कि तटस्थ जांचकर्ताओं की रिपोर्ट आने से पहले ही, सीरिया के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की उतावली अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने क्यों दिखाई? क्या वे इराक को दोहराना चाहते हैं?

सीरिया इस वक्त सुरक्षा के लिहाज से सबसे खतरनाक संभावनाओं वाला इलाका है। एक तरफ राष्ट्रपति बशर अल-असद की सरकार है, जिस पर रासायनिक हथियार जमा करने का आरोप है, और दूसरी तरफ बशर को उखाड़ फेंकने के लिए हथियारबंद विद्रोही हैं, जो किसी से भी हाथ मिला सकते हैं। फिर आइएसआइएस है जो आतंक का पर्याय है। ऐसे में, शांति का रास्ता आसान नहीं है। और भी मुश्किल यह है कि सीरिया बड़ी ताकतों की वर्चस्व की लड़ाई में भी फंस गया है। सीरिया के गृहयुद्ध में रूस सात साल से बशर का साथ देता आ रहा है और 2015 से वहां उसकी सैन्य मौजूदगी भी है। यह अमेरिका और उसके मित्र-देशों को रास नहीं आता। उनकी सैन्य कार्रवाई ने रूस के साथ उनके तनाव को और बढ़ा दिया है। जहां यूरोपीय संघ और आस्ट्रेलिया ने सीरिया के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का समर्थन किया है, वहीं रूस ने इसकी तीखी निंदा करने के साथ ही परिणाम भुगतने की चेतावनी भी दी है।

ईरान ने भी निंदा की है, और चीन ने खुल कर निंदा भले न की हो, यह जरूर कहा है कि पहले रासायनिक हथियार रखने और उसका इस्तेमाल किए जाने, तथा किसने इस्तेमाल किया, इन सबकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए थी। साफ है कि सीरिया पर अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस के मिसाइल-हमले को लेकर दुनिया बंटी हुई है। इस तरह की और भी कार्रवाई करने की उनकी चेतावनी और दूसरी तरफ उनके हवाई हमले की तुलना सोवियत संघ पर हिटलर के हमले से करते हुए रूस की तरफ से जैसी तीखी प्रतिक्रिया आई है उससे विश्व-शांति के लिए एक बड़ा खतरा उपस्थित होने की आशंका जताई गई है। फिलहाल रूस ने खुद कोई जवाबी कार्रवाई न करके अंदेशे को सीमित रखा है। लेकिन अगर अमेरिका और उसके यूरोपीय मित्र सीरिया को फिर निशाना बनाते हैं, तो क्या रूस चुपचाप बैठा रहेगा? सुरक्षा परिषद के लिए यह परीक्षा की घड़ी है।