खुशखबरी है कि इस बार अच्छी बारिश होगी। यह देश के कृषिक्षेत्र के साथ-साथ समूची अर्थव्यवस्था के लिए संतोषजनक बात है। कृषिक्षेत्र की हालत अर्थव्यवस्था को काफी हद तक प्रभावित करती है। पिछले कुछ सालों से देश के ज्यादातर हिस्से सूखे की मार झेल रहे हैं। इसलिए मानसून को लेकर मौसम विभाग ने जो अनुमान व्यक्त किए हैं, वे राहत देने वाले हैं। मौसम विभाग ने बताया है कि इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य रहने की उम्मीद है। मानसून को लेकर यह इस साल का पहला अनुमान है। इसके मुताबिक जून से सितंबर के बीच सनतानवे फीसद बारिश होगी। अगर इसमें कोई कमी-बेशी रही भी, तो यह पांच फीसद से ज्यादा नहीं होगी। मौसम विभाग उपग्रहों से मिलने वाले आंकड़ों से ही मानसून के रुख का आकलन करता है, इसलिए अनुमानों में मॉडल संबंधी त्रुटि हो सकती है। रिजर्व बैंक भी अपनी मौद्रिक समीक्षा में नीतिगत दरों को लेकर जो कदम उठाता है उसमें मानसून संबंधी आकलन एक बड़ा और महत्त्वपूर्ण पहलू होता है। महंगाई का ग्राफ किधर जाएगा, यह भी काफी हद तक मानसून पर निर्भर करता है। मौसम विभाग की भविष्यवाणी सुखद संकेत है।
यह लगातार तीसरा साल है जब मौसम विभाग ने सामान्य मानसून की भष्यिवाणी की है। प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान दो से तीन डिग्री सेल्सियस कम रहेगा, जिसकी वजह से ला-नीनो बनेगा और यह प्रभाव ही अच्छे मानसून का कारक साबित होगा। देश में इस वक्त डेढ़ सौ से ज्यादा जिले भीषण सूखे की चपेट में हैं। इनमें उत्तर प्रदेश और बिहार के जिले सबसे ज्यादा मार झेल रहे हैं। बुंदेलखंड सूखे से सबसे ज्यादा प्रभावित है। सूखे जैसे हालात से महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक भी जूझ रहे हैं। सत्तर फीसद खेती मानसूनी बारिश पर ही निर्भर होती है। जलाशय किस कदर खाली पड़े हैं इसका अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि देश के इनक्यानवे जलाशयों में कुल क्षमता का सिर्फ सत्ताईस फीसद पानी बचा है। इसलिए अच्छी बारिश के आसार सभी के लिए बड़ी राहत की बात है।
कई बार ऐसा भी हुआ है कि मानसून को लेकर मौसम विभाग की भविष्यवाणी सटीक साबित नहीं हुई। 2005 से 2017 के दौरान सात बार ऐसा हुआ जब मौसम विभाग की भविष्यवाणियां खरी नहीं उतरीं। अनुमानित और वास्तविक बारिश में कई बार खासा फर्क देखने को मिलता है। इससे सबसे ज्यादा निराशा किसान को होती है जो अच्छी पैदावार की आस लगाए रहता है। अर्थव्यवस्था भी इससे अछूती नहीं रहती। पैदावार अच्छी होने से कीमतों पर नियंत्रण बना रहता है। याद हो जब 2009 में मानसून गड़बड़ा गया था तो भारत को चीनी का आयात करना पड़ गया था। कृषि अर्थव्यवस्था मानसून पर टिकी होती है। देश के ज्यादातर राज्यों में अधिकांश किसान इतने गरीब हैं कि बैंकों और साहूकारों से कर्ज लेकर खेती करते हैं। ऐसे में अगर मानसून दगा दे जाए तो फसलें चौपट होने में देर नहीं लगती। किसान कर्ज के भारी बोझ तले दब जाते हैं। पिछले कई सालों में हजारों किसान सिर्फ इसीलिए मौत को गले लगा चुके हैं कि वे कर्ज नहीं चुका सकते थे। अच्छा बारिश होगी, तो रिस कर भूजल के रिक्त होते भंडार को भी सहारा देगी। अगर वर्षाजल संचयन का अभियान बड़े पैमाने पर चलाया जाए, तो अच्छे मानसून का कहीं अधिक टिकाऊ लाभ उठाया जा सकता है।
