हाल के दिनों में कुछ कारखानों में लगी आग और उसमें लोगों की मौत की कई घटनाएं हुर्इं। हर बार जांच के बाद यही कारण सामने आया कि ये घटनाएं हादसे से ज्यादा लापरवाही का नतीजा हैं। एक तरह के हालात में हुई दुर्घटना आसपास उन्हीं स्थितियों में काम करने या रहने वाले लोगों के लिए सबक होना चाहिए। लेकिन शायद ही कभी आग लगने की पहले की घटनाओं के कारणों और उसमें होने वाले जान-माल के नुकसान पर गौर किया जाता है। यह बेवजह नहीं है कि कुछ दिन बाद ठीक उसी तरह का कोई हादसा हो जाता है और लोगों की जान नाहक चली जाती है। दिल्ली के नवादा इलाके में बर्तन बनाने वाली एक फैक्ट्री में ऐसी ही लापरवाही के चलते सोमवार की रात आग लग गई, जिसमें जल कर वहां काम करने वाले दो मजदूरों की मौत हो गई, जबकि एक युवक गंभीर रूप से घायल हो गया। प्राथमिक जांच में आग लगने की वजह शॉर्ट सर्किट बताई गई है।
हैरानी की बात है कि फैक्ट्री में जहां आग से निपटने का कोई इंतजाम नहीं था, वहीं ऐसे हालात में जान बचाने के लिए सुरक्षित निकलने का कोई वैकल्पिक रास्ता भी नहीं था। आपराधिक लापरवाही का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि एकमात्र विकल्प के रूप में जो मुख्य दरवाजा है, वह बाहर बंद कर दिया गया था और अंदर कई मजदूर काम कर रहे थे। सवाल है कि आग लगने की स्थिति में सुरक्षा-व्यवस्था में पहले ही व्यापक कोताही बरतने के बाद आखिर किस वजह से फैक्ट्री का दरवाजा बाहर से बंद किया गया था। जबकि यह सामान्य समझ का मामला है कि अचानक हुए किसी भी हादसे की स्थिति में भीतर मौजूद लोगों के सुरक्षित बाहर निकलने के लिए दरवाजे आसानी से खुलने के इंतजाम होने चाहिए। अगर लोग भीतर काम कर रहे हैं तो किसी भी हालत में दरवाजा बाहर से बंद नहीं होना चाहिए। लेकिन ऐसे मामले कई बार सामने आए, जिनमें आग लगने के बाद जब लोगों ने बचने के लिए बाहर भागने की कोशिश की तो दरवाजा बाहर से बंद था या निकलने के रास्ते बाधित थे। सिर्फ इस कारण से कई बड़ी दुर्घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें चर्चित उपहार हादसा भी था, जिसमें उनसठ लोग मारे गए थे।
औद्योगिक इकाइयों में अक्सर आग लगने की घटनाएं होती हैं और उनमें लोगों के मारे जाने की सबसे बड़ी वजह अग्निशमन का पर्याप्त इंतजाम नहीं होना है। बिजली के तार सुरक्षित तरीके से लगाने, कामकाज के समय बाहर निकलने के लिए खुले दरवाजे, चौड़ी सीढ़ियां आदि की जरूरत की अनदेखी आम है। जबकि सिर्फ बाहर निकलने की पर्याप्त व्यवस्था हो तो कई लोगों की जान बचाई जा सकती है। इसके अलावा, कोई भी कारखाना मालिक शायद ही अपने कर्मचारियों को इस बात के लिए प्रशिक्षित करता है कि अचानक आग लगने या किसी हादसे की स्थिति में वहां उपलब्ध संसाधनों के दायरे में बचने के लिए क्या-क्या करें। यह भी छिपा नहीं है कि हर तरफ नजर रखने का दावा करने वाली पुलिस और अन्य संबंधित महकमों के कर्मचारी किस स्तर की लापरवाही बरतते हैं। जबकि गैरकानूनी तरीके से चलने वाली तमाम औद्योगिक इकाइयां आग से सुरक्षा उपायों के प्रमाण-पत्र के बिना चल रही होती हैं। जाहिर है, जब तक इन कारखानों पर नजर रखने वाले महकमों की जवाबदेही तय नहीं होगी, ऐसे हादसों पर काबू पाना मुश्किल बना रहेगा।
