अमेरिका, भारत और जापान की नौसेनाओं का सोमवार को शुरू हुआ साझा अभ्यास इस बार ज्यादा दिलचस्पी का विषय बना है, तो इसकी वजह जाहिर है। यह साझा सामरिक अभ्यास ऐसे वक्त हो रहा है, जब भारत और चीन के बीच, डोकलाम विवाद को लेकर तनातनी जारी है। गौरतलब है कि अभ्यास में हिस्सेदार तीनों देशों के साथ चीन के रिश्ते तनावपूर्ण चल रहे हैं। इसलिए किसी हद तक इस साझा अभ्यास को चीन को चुनौती के तौर पर देखा जाना स्वाभाविक है। पर इसका यह अर्थ नहीं कि अभ्यास का आयोजन चीन को चिढ़ाने या चेताने के मकसद से हुआ है। भारत और अमेरिका केसंयुक्त नौसैनिक अभ्यास की शुरुआत 1992 में ही हो गई थी, जब नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे। कह सकते हैं कि आर्थिक उदारीकरण ही नहीं, सामरिक उदारीकरण की भी नींव राव ने डाली। 1998 से पहले बंगाल की खाड़ी में अमेरिका के साथ तीन साझा अभ्यास हुए थे।
भारत के परमाणु परीक्षण से नाराज अमेरिका ने आगे शामिल होने से मना कर दिया। लेकिन ग्यारह सितंबर 2001 के आतंकी हमले के बाद उसके रुख में बदलाव आया और मालाबार का क्रम फिर शुरू हुआ। हालांकि मालाबार अभ्यास की परिकल्पना में जापान को शुरू से ही शामिल किया गया था, पर स्थायी भागीदार के तौर पर वह 2015 में शामिल हुआ।इस इतिहास को देखते हुए डोकलाम से मालाबार के तार नहीं जोड़े जा सकते। यों भी साझा सैन्य अभ्यास काफी दिनों की तैयारी से ही आयोजित हो पाते हैं। इस बार भी कोई छह महीने पहले से तैयारी शुरू हो गई थी। जबकि डोकलाम विवाद कुछ ही दिनों पहले शुरू हुआ। भारतीय नौसेना के एक आला अधिकारी ने उद्घाटन के दिन कहा भी, कि मालाबार अभ्यास का डोकलाम विवाद से कोई लेना-देना नहीं है, न इसका मकसद चीन को ताकत दिखाना है। लेकिन पहली बार मालाबार अभ्यास इतने जोश-खरोश और इतनी तैयारी से हो रहा है। यह भी पहली बार है कि इसे लेकर चीन बेचैनी महसूस कर रहा है। साझा अभ्यास की गहनता का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि अमेरिका, भारत और जापान, तीनों देशों ने अपने सबसे बड़े युद्धपोत इसमें शामिल किए हैं। अमेरिका एक लाख टन वजनी विमानवाहक पोत निमित्ज इसमें हिस्सा ले रहा है तो भारतीय विमानवाहक पोत आइएनएस विक्रमादित्य और जापानी सेना का सबसे बड़ा हेलिकॉप्टर वाहक युद्धपोत इजुमी भी इसमें शामिल हैं। तीनों देशों के बीस से ज्यादा युद्धपोत हिस्सा ले रहे हैं। चिकित्सा अभियान, खतरा न्यूनीकरण, विस्फोटक आयुध निपटान, हेलिकॉप्टर अभियान के अलावा, पहली बार पनडुब्बी-रोधी कार्रवाई का अभ्यास हो रहा है और इस पर खास जोर है।
यह सही है कि मालाबार को डोकलाम से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता, क्योंकि मालाबार साझा अभ्यास काफी पहले से चला आ रहा है और यह उसका इक्कीसवां सत्र है। पर चीन के साथ भारत, अमेरिका और जापान, तीनों देशों की तनातनी ने इस साझा अभ्यास को एक नया रंग जरूर दे दिया है। इसका संदेश साफ है, हम साथ हैं। इस अभ्यास पर चीन की गहरी नजर है। खबर यह भी है कि मालाबार अभ्यास पर निगाह रखने के लिए उसने अपने टोही पोत भेजे हैं। अमेरिका के लिए यह एशिया में सुरक्षा-समीकरणों को अपने ढंग से प्रभावित करने का अवसर है, तो भारत के लिए दुनिया की सबसे ताकतवर नौसेना से बहुत कुछ सीखने तथा अपनी रणनीतिक तैयारी को और पुख्ता करने का।
