उत्तर प्रदेश में सोनभद्र के एक स्कूल में दर्जनों छात्राओं के साथ जैसा बर्ताव किया गया, वह हमारी शिक्षा पद्धति के एक बेहद अफसोसनाक पहलू का उदाहरण है। अनपुरा विद्युत परिषद बालिका विद्यालय में सोमवार को कई छात्राओं को सजा के तौर पर ‘मुर्गा’ बनाया गया, फिर स्कर्ट उतरवा कर उन्हें समूचे स्कूल में घुमाया गया, महज इसलिए कि उन्होंने अपना होमवर्क पूरा नहीं किया था। सभी कक्षाओं में इन बच्चियों को घुमाते हुए स्कूल की प्रधानाध्यापक ने बाकी तमाम छात्राओं को यह चेतावनी दी कि अगर किसी ने होमवर्क नहीं किया तो उसके साथ भी यही सलूक किया जाएगा। एकबारगी यह एक सामंती इलाके के गांव की उस घटना की तरह लगती है जिसमें कमजोर तबके की किसी महिला परडायन होने या उसके चरित्र पर कोई अन्य लांछन लगा कर दबंग लोग प्रताड़ित करते हैं, अर्धनग्न करके गांव में घुमाते हैं। जाहिर है, जो हुआ वह एक आपराधिक कृत्य है। यह बेहद अफसोसनाक है कि ऐसे असभ्य व्यवहारों की जकड़न से निकाल कर समाज को सभ्य बनाने की जिम्मेदारी उठाने वाले किसी स्कूल में बेहद मामूली बात के लिए बच्चियों की स्कर्ट उतरवा कर कक्षाओं में सबके सामने परेड कराई गई। क्या ऐसे बर्ताव के उन बच्चियों के मन-मस्तिष्क पर पड़े मनोवैज्ञानिक असर का अंदाजा लगाया जा सकता है?
सुप्रीम कोर्ट ने सन 2000 में ही स्कूलों में बच्चों को किसी भी तरह की सजा देने पर पाबंदी लगा दी थी। क्या शिक्षक-शिक्षिकाओं को कानून का भी कोई डर नहीं है? अव्वल तो स्कूल में होमवर्क पूरा न कर पाना कोई ऐसी गलती नहीं है जिसमें सुधार के लिए सजा का सहारा लिया जाए। फिर जब किसी भी तरह की बात के लिए स्कूली बच्चों के साथ न सिर्फ मारपीट, बल्कि डांट-डपट की भी मनाही है तो शिक्षकों को अपनी इस कानूनी ड्यूटी का पालन करना जरूरी क्यों नहीं लगता? इस घटना में सजा की प्रकृति को देखने के बाद पीड़ित छात्राओं के अलावा समूचे स्कूल में पढ़ने वाली लड़कियां क्या सहज होकर अपनी पढ़ाई-लिखाई कर पाएंगी?
तमाम अध्ययन बताते हैं कि पढ़ाई-लिखाई के दौरान बच्चों के साथ सख्ती से पेश आना या पिटाई के सहारे उनकी गलतियों या कमियों को दूर करने की कोशिश उन पर उलटा असर डालती है। स्कूली बच्चे अगर सीखने के मामले में पिछड़ जाते हैं और पांचवीं-छठी कक्षा के बच्चे दूसरी कक्षा की किताब भी नहीं पढ़ पाते, तो इसकी क्या वजह होगी! विडंबना यह है कि पढ़ाई-लिखाई के नाम पर बच्चों के प्रति सख्ती एक आम चलन है और स्कूल से लेकर समाज तक में बच्चों के बेहतर भविष्य की उम्मीद में काफी हद तक स्वीकार्य भी माना जाता है। होमवर्क पूरा न करने या पढ़ाई के मामले में किसी भी तरह की कमी को दूर करने के मसले पर हुए अध्ययनों में बच्चों के साथ अनुकूल व्यवहार और प्यार से पेश आने को ही सबसे बेहतर उपाय बताया गया है। पर समस्या यह है कि ये सारे निष्कर्ष कागजी होकर रह गए हैं, जबकि जरूरत उन पर अमल की है।

