म्यांमा के रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में शरण देने के सवाल पर केंद्र सरकार ने अपना रुख एकदम साफ कर दिया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कहा है कि रोहिंग्या समुदाय के लोगों का देश में रहना राष्ट्र की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है। गैरकानूनी तौर पर भारत में रह रहे शरणार्थी इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं कर सकते। हलफनामे में यहां तक कहा गया कि सरकार अदालत से ऐसी खुफियां जानकारियां साझा करना चाहती है, जिससे पता चलता है कि रोहिंग्या शरणार्थी पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी और कुछ आतंकी समूहों के संपर्क में हैं। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय खंडपीठ दो शरणार्थियों की जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है। याचिका में मांग की गई है कि शरणार्थियों को उनके देश वापस न भेजा जाए, क्योंकि वहां सेना उनका दमन कर रही है। वे संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थियों के उच्चायोग के तहत पंजीकृत शरणार्थी हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से कुछ अंतरराष्ट्रीय संधियों का हवाला दिया गया है और कहा गया है कि मानवीयता के आधार पर उन्हें शरण पाने का हक है। जबकि सरकार की ओर दिए गए जवाब में कहा गया है कि याचिकाकर्ताओं ने संयुक्त राष्ट्र की 1951 की जिस संधि और 1967 के जिस प्रोटोकाल का उल्लेख किया है, भारत ने उस पर हस्ताक्षर ही नहीं किए हैं। इसलिए उनके प्रावधान भारत पर लागू नहीं होते।
गौरतलब है कि करीब चालीस हजार रोहिंग्या मुसलमान जम्मू, हैदराबाद,हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान में रह रहे हैं। वास्तव में देखा जाए तो ताजा संकट तब पैदा हुआ जब 25 अगस्त, 2017 को म्यामां की पच्चीस सैनिक चौकियों पर अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी (एआरएसए) के लड़ाकों ने हमला बोल दिया, जिसमें एक दर्जन सुरक्षाकर्मी मारे गए। इसके बाद म्यांमा सेना ने वहां सफाई अभियान शुरू कर दिया। तब से अब तक करीब चार लाख रोहिंग्या मुसलमान भाग कर इधर-उधर शरण लिए हुए हैं। ज्यादातर बांग्लादेश में हैं। म्यांमा में बौद्ध धर्म के अनुयायी बहुसंख्यक हैं और लंबे समय से उनका रोहिंग्या मुसलमानों से मनमुटाव चला आ रहा है।
म्यांमा की नेता और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता आंग सान सू की ने संयुक्त राष्ट्र और कुछ मानवाधिकार संगठनों के दबाव पड़ने पर आखिरकार मंगलवार को अपनी लंबी चुप्पी तोड़ी है। उन्होंने रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ की गई हिंसा की निंदा की। लेकिन साथ में यह दिलाना भी नहीं भूलीं कि अगस्त में सेना की चौकियों पर रोहिंग्या उग्रवादियों ने आतंकी हमले किए थे। म्यामां नेता ने हालांकि यह आश्वासन दिया है कि वे पलायित देशवासियों की वापसी के लिए तैयार हैं। लेकिन एमनेस्टी इंटरनेशल जैसे मानवाधिकार समूहों ने उनके बयान को खारिज कर दिया है। इससे पहले संयुक्त राष्ट्र ने म्यांमा के रखाइन प्रांत में हुई हिंसा को ‘नस्लीय सफाया’ करार दिया था। यह सही है कि बड़ी संख्या में रोहिंग्या मुसलमान भगाए गए हैं और उनकी तकलीफों से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन यह भी सही है कि उनके भीतर के ही चंद लोग आतंकी कार्रवाइयों में शामिल हैं, जिसका इशारा म्यांमा नेता सू की ने भी किया है और भारत सरकार भी वही कह रही है। चंद सिरफिरे लोगों की करतूतों की सजा पूरे समुदाय को नहीं दी जा सकती। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अगर किसी देश को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा का खतरा दिखाई देगा तो स्वाभाविक ही वह दया और करुणा की अपीलों पर सौ बार सोचेगा।

