रिजर्व बैंक ने उम्मीदों से उलट मौद्रिक नीति में कोई बदलाव नहीं किया है। माना जा रहा था कि इस बार रेपो दर में कुछ कटौती की जाएगी। अक्तूबर में रेपो दर में पच्चीस आधार अंक की कटौती करते हुए नए गवर्नर उर्जित पटेल ने संकेत दिया था कि अगली मौद्रिक नीति में कुछ और कटौती की जाएगी। इसलिए कारोबार जगत और आम लोगों को उम्मीद थी कि ऐसा ही कोई फैसला आएगा। रेपो दर में कटौती की जाती तो लोगों को कर्ज पर मासिक किश्तों का बोझ कुछ कम पड़ता। उद्योगजगत को अपने विस्तार में मदद मिलती। ब्याज दरें कम करने की मांग काफी समय से की जा रही है। मगर रिजर्व बैंक ने इसमें कोई बदलाव करने का जोखिम उठाने से परहेज किया। दरअसल, नोटबंदी के बाद कारोबार पर प्रतिकूल प्रभाव दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि नोटबंदी का असर अर्थव्यवस्था पर अगले दो साल तक रहने वाला है। चालू तिमाही में उद्योग जगत की विकास दर धीमी रहने का अनुमान है। बाजार में मुद्रा का प्रवाह बढ़ाने के मकसद से रेपो दर और रिवर्स रेपो दर में कटौती का फैसला महंगाई बढ़ाने का कारण बन सकता था। ऐसे में रिजर्व बैंक ने फूंक-फूंक कर कदम रखना उचित समझा।
रिजर्व बैंक अक्तूबर में रेपो दर में पच्चीस आधार अंक की कटौती करने का साहस इसलिए कर सका कि महंगाई काबू में आती दिख रही थी। राजकोषीय घाटा नियंत्रण में आ रहा था। मानसून अच्छा रहने से जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान बेहतर होने का आकलन था। मगर तीस नवंबर के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। कई कंपनियों ने तेल के उत्पादन पर विराम लगाने का फैसला किया है। ऐसे में वस्तुओं की कीमतें बढ़नी स्वाभाविक है। नोटबंदी के बाद बैंकों के पास पुराने नोट काफी जमा हो गए हैं, मगर नए नोट पर्याप्त मात्रा में न आ पाने के कारण भी खुले बाजार में मुद्रा की तरलता को संतुलित करना कठिन बना हुआ है। इसलिए रेपो दर में कटौती से नगदी का प्रवाह बढ़ने की गुंजाइश कम ही रहती।
रेपो दरों में कटौती का लाभ सबसे अधिक कर्ज पर नए मकान, वाहन, घरेलू उपकरण खरीदने वाले लोगों को होता है। मगर इसके उलट उन लोगों को नुकसान उठाना पड़ता है, जो बैंकों में अपना पैसा इसलिए जमा कराते हैं कि उसके बदले उन्हें ब्याज मिल सकेगा। मगर नोटबंदी और काले धन पर शिकंजा कसने के प्रयासों के चलते भवन निर्माण और वाहन बाजार में मंदी चल रही है। रेपो दर में कटौती से इन क्षेत्रों पर बहुत असर शायद ही नजर आता। नोटबंदी का असर कृषि क्षेत्र पर भी पड़ रहा है। बुआई पिछड़ रही है। नगदी का प्रवाह कम होने से खड़ी कच्ची फसल की बिक्री में मुश्किलें आ रही हैं। ऐसे में रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें बढ़ने का अंदेशा कम नहीं हुआ है। महंगाई को काबू में रखना और साथ ही अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। कई मौकों के उदाहरण मौजूद हैं जब बैंक दरों में कटौती करने से उद्योगजगत की रफ्तार तो तेज हुई, पर महंगाई की दर को नीचे ला पाना कठिन हो गया। इसलिए भी रिजर्व बैंक की हिचक समझी जा सकती है। नए नोट का प्रवाह बढ़ने और फिर बाजार की स्थिति के आकलन के बाद ही शायद कोई फैसला लिया जा सकेगा।

