बिहार के शेखपुरा जिले में मालगाड़ी की चपेट में आकर नौ लोगों की मौत को महज एक हादसा नहीं कहा जा सकता। यह विकास का वह विरोधाभासी चेहरा है, जिसमें एक छोटे हिस्से की चमक बनाए रखने की कीमत बाकी के छूट गए अंधेरे इलाकों को चुकानी पड़ती है। रविवार की रात सिरारी रेलवे स्टेशन से आधा किलोमीटर दूर कौड़िहारी नदी के ऊपर से गुजरती पटरी को पार करते लोग अपने गांव सिसमा लौट रहे थे कि अचानक एक मालगाड़ी आई और बीच में फंसे लोगों को रौंदती गुजर गई। हादसे के शिकार लोग या तो नदी में कूद जाते या फिर ट्रेन के नीचे आ जाते। इस हादसे के बाद एक राय यह होगी कि हादसे के शिकार लोग रेल की पटरी पर चलने का जोखिम क्यों उठा रहे थे। पर सवाल है कि आखिर इतने सालों से लोग नदी पार करने के लिए उस खतरनाक पुल का ही सहारा क्यों ले रहे थे? एक मजबूरी के बरक्स ऐसे सवाल जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने और व्यवस्था की अनदेखी की ही कोशिश होंगे।

दरअसल, सिसमा गांव से मजदूरी या किसी दूसरे काम के लिए बाहर जाने और वापस लौटने के लिए नदी पार करने का कोई विकल्प या दूसरा पुल नहीं है। मजबूरी में लोगों को नदी पर रेलवे पुल का सहारा लेना पड़ता है। आसपास की आबादी से लेकर मरम्मत के लिए खुद रेलकर्मियों को भी वहां से गुजरने की नौबत आ सकती है। फिर ऐसे पुल बनाते हुए किनारे पैदल का रास्ता या थोड़ी-थोड़ी दूरी पर खड़ा होने के लिए सुरक्षा घेरा बनाने की जरूरत क्यों महसूस नहीं की गई जबकि कई नदियों के ऊपर से गुजरने वाले बड़े पुलों के दोनों ओर पैदल चलने या फिर बीच में रुकने के लिए सुरक्षा घेरा बनाया गया है। इसके अलावा, जब उस पुल से लोगों का आना-जाना रोज की मजबूरी है तो सरकार या रेलवे की ओर से वहां कोई ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं की जाती कि ट्रेन आने वाली हो तो उसका संकेत दोनों तरफ साफ देखा जा सके। करीब पौने चार साल पहले बिहार के खगड़िया जिले में धमारा घाट पर भी ठीक इसी तरह के हादसे में सैंतीस लोगों की जान चली गई थी। मगर उसके बाद भी कोई सबक लेना जरूरी नहीं समझा गया।

रेलवे की ओर से इसका खयाल रखे जाने से ज्यादा जरूरी सवाल यह है कि जिस जगह नदी पर रेल के गुजरने के लिए पुल बनाया गया, वहां आबादी होने के बावजूद एक सड़क पुल बनाना क्यों जरूरी नहीं समझा गया है, ताकि लोगों को रेल की पटरी से होकर नदी पार करने का जोखिम न उठाना पड़े? ऐसी अनेक जगहें हैं जहां आज तक सड़क नहीं पहुंची है। अगर वहां कोई नदी है तो उसे पार करने के लिए पुल नहीं है, जबकि उसके आसपास से रेल की पटरियां नदी को पार करती गुजरती हैं और बहुत सारे लोगों के लिए जोखिम के बावजूद वही सहारा होती हैं। कई जगहों पर लोगों ने अपने स्तर से कोशिश करके कामचलाऊ पुल बना लिए हैं, जो अक्सर बाढ़ के दिनों में बह जाते हैं। एक ओर जहां भारतीय रेल को विश्वस्तरीय चेहरा देने और बुलेट ट्रेन चलाने के दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर विकल्प के अभाव में पटरियों पर चलते लोगों का ट्रेन की चपेट में आकर मर जाना एक त्रासदी ही लगता है।