मध्यप्रदेश और राजस्थान में सरकारी अस्पताल में चिकित्सकों की जैसी संवेदनहीनता और व्यवस्था में घोर लापरवाही सामने आई है, उसके मद््देनजर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने उचित ही दोनों सरकारों को नोटिस जारी किया है। दोनों सरकारों को चार हफ्ते के भीतर नोटिस का जवाब और कार्रवाई का ब्योरा देने को कहा गया है। गौरतलब है कि मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ जिला अस्पताल में प्रसव पीड़ा से कराहती एक महिला को डॉक्टरों ने सिर्फ इसलिए भर्ती करने से इनकार कर दिया कि वह एचआइवी पॉजीटिव थी। एक ओर सरकार एड्स को लेकर जागरूकता अभियान चलाने पर अरबों रुपए खर्च करती है, और दूसरी ओर, खुद अस्पताल में एक एचआइवी से पीड़ित गर्भवती महिला को भर्ती करने से मना कर दिया जाता है। जबकि एड्स या एचआइवी पॉजीटिव मरीज के साथ अस्पतालों में किसी भी तरह का भेदभाव अब कानूनन अपराध है। जानकारी या जागरूकता के अभाव में अगर आम लोग किसी वहम में ऐसा करते हैं तो उसकी वजहें समझी जा सकती हैं, लेकिन अगर खुद डॉक्टर ऐसा व्यवहार करें तो यह अपने आप में एक गंभीर सवाल है। उन हालात की कल्पना भी शर्मनाक है कि अस्पताल में जगह न मिलने पर उस महिला ने खुले में ही जुड़वां बच्चों को जन्म दिया, जो इलाज के अभाव में आधा घंटे के भीतर मर गए। इसलिए मानवाधिकार आयोग ने कहा है कि यह डॉक्टरों की क्रूरता का निकृष्ट उदाहरण है।

दूसरी ओर, राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के सरकारी अस्पताल में महज दो महीने के भीतर नब्बे बच्चों की मौत हो गई। जिस समय सरकारी अस्पतालों की बदइंतजामी और डॉक्टरों के रुख को लेकर समूचे देश में तीखे सवाल उठ रहे हैं, तब इस तरह की घटनाओं का जारी रहना क्या दर्शाता है? सरकारी अस्पतालों को आखिर क्यों और किन लोगों के भरोसे छोड़ दिया गया है कि वहां जान बचाने की उम्मीद लेकर आए मरीज मौत के मुंह में चले जा रहे हैं? पिछले दिनों कहीं अस्पतालों की अव्यवस्था तो कहीं चिकित्सकों की लापरवाही और कहीं घोर संवेदनहीनता की वजह से मरीजों और उनके परिजनों को बेहद तकलीफदेह हालात का सामना करना पड़ा। गोरखपुर के एक सरकारी अस्पताल में आॅक्सीजन की आपूर्ति बाधित होने के चलते अचानक तीस बच्चों सहित कुछ दिनों के भीतर करीब तीन सौ बच्चों की जान चली गई। तब समूचे देश में इस बात पर आक्रोश फैला कि जहां लोग बीमारी की हालत में जिंदगी की उम्मीद लेकर जाते हैं, वहां रोग के बजाय प्रबंधन की खामियों की वजह से बच्चों की मौत हो रही है!

विडंबना यह है कि इन घटनाओं से सबक लेकर दूसरी जगहों के अस्पतालों के भी प्रबंधन और व्यवस्था में खामियों को दूर करने के बजाय उनको उनके हाल पर छोड़ दिया गया है। यही वजह है कि आए दिन अस्पतालों में चिकित्सकों की लापरवाही के चलते बच्चों के मरने की खबरें आ रही हैं। ऐसी घटनाओं की तस्वीरें किसी भी संवेदनशील इंसान को आक्रोश से भर दे सकती हैं कि कोई व्यक्ति अपने परिजन के शव को कंधे पर ढोते हुए घर ले गया, क्योंकि अस्पताल ने उसके लिए एंबुलेंस या शव-वाहन की व्यवस्था नहीं की। दरअसल, संसाधनों की कमी, व्यवस्था में लापरवाही और चिकित्सकों की संवेदनहीनता- ये सब भारत में उन अस्पतालों की खासियत हैं, जहां कमजोर या उपेक्षित तबके के लोग लाचारी में जाते हैं।