संसद के शीतकालीन सत्र के तीन हफ्ते बीत गए, लेकिन अब तक कार्यवाही सामान्य नहीं हो पाई है तो इसलिए कि नोटबंदी के मसले पर उठा विवाद अब भी शांत होने का नाम नहीं ले रहा। एक ओर विपक्ष इस बात पर अड़ा हुआ है कि प्रधानमंत्री सदन में इस मसले पर जवाब दें, दूसरी ओर सत्ता पक्ष चर्चा पर जोर दे रहा है। देश की स्थिति और उसमें संसद की भूमिका को समझने वाला कोई भी व्यक्ति इस स्थिति पर चिंतित हो सकता है। इसलिए भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के क्षोभ को समझा जा सकता है। उन्होंने सदन न चल पाने के लिए न केवल संसदीय कार्य मंत्री को जिम्मेदार ठहराया, बल्कि लोकसभा अध्यक्ष पर भी अंगुली उठाई। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि उन्होंने गुस्से में सदन को अनिश्चितकाल तक स्थगित कर देने की सलाह दे डाली।
निश्चित रूप से यह पिछले कई दिनों से लगातार चल रहे हंगामे के बीच सब कुछ देखने-समझने के बाद की प्रतिक्रिया है। लेकिन भारतीय राजनीति में लालकृष्ण आडवाणी के अनुभव और कद के मद्देनजर उनकी बातों को हल्के तौर पर नहीं लिया जाना चाहिए। आडवाणी की ताजा टिप्पणी को किसी एक दल या पक्ष पर उठाई गई अंगुली के तौर पर भी नहीं देखा जा सकता। उन्होंने अगर विपक्ष के हंगामे से सहमति नहीं जताई है, तो सत्ता पक्ष को भी सदन बाधित करने का जिम्मेदार ठहराया। यों भी, जब संसद की कार्यवाही बाधित होती है, तो आमतौर पर केवल विपक्षी दलों को इसके लिए कठघरे में खड़ा किया जाता है। मगर इस बात की अनदेखी कर दी जाती है कि विपक्षी दलों के किसी बात पर अड़ने के पीछे कारण क्या हैं और सदन को बाधित करने के लिए सत्ता पक्ष की भी कोई जवाबदेही बनती है या नहीं! मसलन, फिलहाल नोटबंदी की अचानक घोषणा के बाद से समूचे देश में जो संकट खड़ा हुआ है उसके लगातार गहराते जाने के मद्देनजर विपक्ष की इस मांग को गैरवाजिब नहीं कहा जा सकता कि प्रधानमंत्री इस मसले पर सदन में बयान दें। इस मांग के पीछे आधार यह हो सकता है कि जब मुद्रा से संबंधित नीतिगत फैसले की घोषणा करना पारंपरिक रूप से रिजर्व बैंक का काम माना जाता रहा है, तो प्रधानमंत्री के स्तर से यह निर्णय और इसकी घोषणा होने की नौबत क्यों आई!
अचानक नोटबंदी के बाद से देश भर में एक तरह से अव्यवस्था का माहौल बना हुआ है। अपने पैसे बैंक में जमा होने के बावजूद लोग थोड़े पैसे के लिए भी भटकने पर मजबूर हैं और इसी वजह से अब तक लगभग सौ लोगों की मौत की खबरें आ चुकी हैं। लोगों के पास नगदी न होने के चलते समूचे बाजार का कारोबार गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है। ऐसी स्थिति में यह सवाल स्वाभाविक है कि बिना तैयारी के नोटबंदी के फैसले को अचानक लागू करने के बाद पैदा हालात से निपटने के लिए सरकार क्या कर रही है! भ्रष्ट तरीके से अर्जित धन पर काबू पाने की बात से कोई भी असहमत नहीं होगा। लेकिन फिलहाल जो हालात हैं, उसमें जरूरत इस बात की है कि सरकार और विपक्ष दोनों मिल कर रोज गहराते संकट का कोई हल निकालें। यह न केवल संसद की कार्यवाही को सामान्य तरीके से चलाने, बल्कि नोटबंदी से उपजी परेशानी को तुरंत दूर करने के स्तर पर भी हो।

