उत्तर कोरिया ने एक बार फिर परमाणु हथियार का परीक्षण किया है। उसकी इस कारस्तानी पर स्वाभाविक ही दुनिया भर में तीखी प्रतिक्रिया हुई है। दक्षिण कोरिया ने कहा है कि किम जोंग-उन की ‘सनक भरी लापरवाही उत्तर कोरिया को आत्म-विनाश की तरफ ले जाएगी।’ वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उत्तर कोरिया पर नए प्रतिबंध लगाए जाने की चेतावनी दी है। रूस ने भी चेताया है। यहां तक चीन और पाकिस्तान ने भी इस परीक्षण की खुलकर निंदा की है, जिनके बारे में एक समय माना जाता था कि वे उत्तर कोरिया की गुपचुप मदद करते हैं। आइएइए प्रमुख यूकिया अमानो ने भी उत्तर कोरिया के खिलाफ नए प्रतिबंधों के संकेत दिए हैं। पिछले हफ्ते उत्तर कोरिया ने जिस परीक्षण को अंजाम दिया वह उसका पांचवां एटमी परीक्षण है। पहला 2006 में हुआ था। फिर दूसरा 2009 और तीसरा 2013 में। चौथा परीक्षण इसी साल जनवरी में हुआ था। उत्तर कोरिया के दावे के मुताबिक इस बार का ‘दस किलोटन का विस्फोट’ चौथे परीक्षण का करीब दोगुना था। और भी चिंता की बात यह है कि इस परीक्षण से कुछ ही दिन पहले उत्तर कोरिया ने बैलिस्टिक मिसाइलों के परीक्षण किए थे, जो एटमी हथियारों को ले जाने में सक्षम होती हैं। लिहाजा, दुनिया के माथे पर चिंता की लकीरें और उत्तर कोरिया के पड़ोसी देशों की घबराहट साफ पढ़ी जा सकती है। अब सवाल यह है कि उत्तर कोरिया के शासक किम जोंग-उन की इस फितरत पर लगाम कैसे लगे।

उत्तर कोरिया के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक प्रतिबंध कई साल से जारी हैं। इस साल जनवरी में हुए परीक्षण के बाद मार्च में उस पर अंतरराष्ट्रीय शिकंजा और बढ़ गया। अब कुछ और प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। लेकिन अब तक का अनुभव बताता है कि प्रतिबंधों से उत्तर कोरिया के लोगों को भले तकलीफें उठानी पड़ी हों और वे दुनिया से कटे-कटे रहने को विवश हों, किम जोंग-उन और उनके फौजी तंत्र को कोई फर्क नहीं पड़ा है। वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने का उनका दुस्साहस उनकी तानाशाही की देन है। वे सिर्फ अंतरराष्ट्रीय चिंताओं के प्रति संवेदनहीन नहीं हैं, अरसे से अपने देश के लोगों के मानवाधिकारों का हनन करते रहने में भी उन्हें कोई हिचक नहीं है।

किम जोंग-उन के एटमी परीक्षणों को देखते हुए अमेरिका दक्षिण कोरिया में मिसाइलें तैनात करने का निर्णय कर सकता है जिसके साथ उसकी सुरक्षा संधि है। पर इससे तनाव और बढ़ेगा ही। छह देशों के समूह ने वार्ता के जरिए उत्तर कोरिया को परमाणु-विमुख करने की बहुत कोशिश की, पर वह नाकाम रही। ऐसी कोशिश फिर से करने में कोई हर्ज नहीं है, पर अच्छा होगा कि उत्तर कोरिया पर दबाव डालने की अंतरराष्ट्रीय रणनीति की कमान चीन को सौंपी जाए, जो कुछ साल पहले तक उसका खास मददगार था। इस पर भी विचार करने की जरूरत है कि परमाणु अप्रसार की नीति कितनी कारगर है? यह नीति परोक्ष रूप से एटमी हथियार और तकनीक पर कुछ देशों के एकाधिकार की ही नीति साबित हुई है। दूसरी ओर, परमाणु हथियार या तकनीक कहीं किसी आतंकवादी संगठन के हाथ न लग जाए इस अंदेशे से दुनिया डरी रहती है। इसलिए अच्छा होगा कि पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण के लक्ष्य को अपनाया जाए और जल्दी से जल्दी उसे पा लेने की कोशिश हो।